अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
08.28.2016


चिन्गारी भर दे मन में

ऐसा गीत सुनाओ कविवर, ख़ुद्दारी भर दे मन में।
परिवर्तन लाने की ख़ातिर, चिन्गारी भर दे मन में॥

हम सब यारो देख रहे हैं, कैसे हैं हालात अभी?
क़दम क़दम पर आमजनों को, मिलते हैं आघात अभी।
हक़ की रखवाली करने को, आमलोग ने चुना जिसे,
महलों में रहते क्या करते, हम सब की वे बात अभी?

सत्य लिखो पर वो ना लिखना, मक्कारी भर दे मन में।
परिवर्तन लाने की ख़ातिर, चिन्गारी भर दे मन में॥

लिखो हास्य पर व्यंग्य साथ में, लोगों से सम्वाद करो।
भूत-प्रेत और जादू-टोना, से उनको आज़ाद करो।
भूख-ग़रीबी से लड़ना है, ऐसे शब्द सजाओ तुम,
जाति-धरम से ऊपर उठकर, कोई नहीं विवाद करो।

कभी नहीं ऐसा कुछ लिखना, लाचारी भर दे मन में।
परिवर्तन लाने की ख़ातिर, चिन्गारी भर दे मन में॥

बिना आग उगले लेखन में, आपस का सद्भाव रहे।
लोग जगें और मिल सहलायें, अगर किसी को घाव रहे।
शब्दों की दीवार बना दो, रोके नफ़रत की आँधी,
सबको सुमन बराबर अवसर, जहाँ पे जिसका चाव रहे।

ऐसी तान कभी मत छेड़ो, बीमारी भर दे मन में।
परिवर्तन लाने की ख़ातिर, चिन्गारी भर दे मन में॥


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें