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ISSN 2292-9754

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08.27.2016


बेबसी

बात गीता की आकर सुनाते रहे
आईने से वो ख़ुद को बचाते रहे

बनते रावण के पुतले हरएक साल में
फिर जलाने को रावण बुलाते रहे

मिल्कियत रौशनी की उन्हें अब मिली
जा के घर घर जो दीपक बुझाते रहे

मैं तड़पता रहा दर्द किसने दिया
बन के अपना वही मुस्कुराते रहे

उँगलियाँ थाम कर के चलाया जिसे
आज मुझको वो चलना सिखाते रहे

गर कहूँ सच तो कीमत चुकानी पड़े
न कहूँ तो सदा कसमसाते रहे

बेबसी क्या सुमन की ज़रा सोचना
टूटने पर भी ख़ुशबू लुटाते रहे



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