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04.28.2007
 
आत्मबोध
श्यामल सुमन

सीख सिखाना काम सरल है, करके दिखाओ तो सब जाने।
बारी अपनी है आती जब, लगते हैं वे पीठ दिखाने।।

जीवन-मूल्यों की हालत अब, उपवन की पतझड़ सी लगती।
स्वर्ग-नर्क का भ्रम ऐसा कि, जी लेते बस इसी बहाने।। 

नहीं समस्या धर्म जगत में, उपदेशक है जड़ उलझन की।
धर्म तो है कर्तव्य आज का, पर गाते वे राग पुराने।।

वृथा न्याय की बातें हैं नित, सजती अर्थी नैतिकता की।
पहले घाव हृदय में देता, फिर आता उसको सहलाने।।

बिलख रही ममता सड़कों पर, आँगन में रोटी का क्रन्दन।
कारण पूछो तो लगते हैं, पूर्व जन्म के पाप गिनाने।।

दीप ज्ञान का जलना मुश्किल, मँहगी शिक्षा के इस युग में।
वे बच्चे कैसे पढ सकते, निकले हैं जो भूख मिटाने।।

टूट रहे हैं डोर प्रेम के, घटी चाँद की शीतलता भी।
देर हो रही कब जागोगे, सुमन लगे हैं अब मुरझाने।।

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