अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
08.27.2016


आदत

मेरी यही इबादत है।
सच कहने की आदत है।।

मुश्क़िल होता सच सहना तो।
कहते इसे बग़ावत है।।

बिना बुलाये घर आ जाते।
कितनी बड़ी इनायत है।

कभी ज़रूरत पर ना आते।
इसकी मुझे शि्क़ायत है।।

मीठी बातों में भरमाना।
इनकी यही शराफ़त है।।

दर्पण दिखलाया तो कहते।
देखो किया शरारत है।।

झूठ कभी दर्पण न बोले।
बहुत बड़ी ये आफत है।।

ऐसा सच स्वीकार किया तो।
मेरे दिल में राहत है।।

रोज विचारों से टकराकर।
झुका है जो भी आहत है।।

सत्य बने आभूषण जग का।
यही सुमन की चाहत है।।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें