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12.26.2008
 

स्वर्ग - नर्क
श्याम कोरी 'उदय'


नर्क कहाँ - स्वर्ग कहाँ,
किसने देखा , किसने जाना,
किसने माना, किसने भोगा,
कौन पहुँचा, कौन जाने,
स्वर्ग कैसा - नर्क कैसा,

रास्ता तो रास्ता,
पगडंडी भी दिखती नहीं,
दूर तक, दूर तक,
और दूर तक तकता रहा,

न दिखा कोई जाता हुआ,
स्वर्ग की ओर, नर्क की ओर,

और तो और,
न दिखे वो रास्ते,
और न दिखी वो गाड़ियाँ,
न दिखे यमदूत भी,
और न दिखी वो अप्सराएँ,

क्यों सुनते हो, सुनाते हो,
कहानी स्वर्ग की,
क्यों डरते हो, डराते हो,
नर्क के नाम से,

क्यों भटकते हो, तड़फते हो,
बिलखते हो,
स्वर्ग - नर्क के नाम से,

देखो, जरा देखो,
दिखेगा स्वर्ग - नर्क,
तुमको यहीं - कहीं,
दिखेंगे देव भी,
यमदूत भी,
तुमको ज़माने में,

यहीं पर भोगते हैँ सब,
यहीं पर है भोगना सब को,
करोगे कर्म अच्छे तो,
मिलेगी मौत भी अच्छी,
करोगे कर्म सच्चे तो,
कटेगी ज़िन्दगी अच्छी,

बनोगे पाप के हिस्से,
रहोगे जुर्म के साथी,
चलोगे भ्रष्ट के पथ पर,
तो देखोगे नर्क आँखों से,
बनोगे नर्क के हिस्से,

तुम्हारा नर्क होगा मन,
तुम्हारा नर्क होगा तन,

जरा बैठो, जरा सोचो,
स्वर्ग कैसा - नर्क कैसा,
नर्क कहाँ - स्वर्ग कहाँ ।


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