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09.15.2007
 
उलझन
श्वेता सुधांशु

मैंने अभी अभी सीखी
दुनियादारी
और तब से हूँ
इस सोच में गुम
कि एक ही चेहरे से
कैसे गुजारूँगी
’तमाम उम्र’


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