स्याही-हीन कलम बरबस बन्द नयन दबी-दबी आवाज़ बावजूद इसके मेरे भीतर का इंसान जिए जा रहा है हरपल लगातार इस उम्मीद में कि मस्तिष्क में बचा रखी है जो थोड़ी सी आग उससे कभी न कभी रची जा सकेगी – ’एक पूरी दुनिया साधन सम्पन्न, हरीभरी’