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ISSN 2292-9754

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12.17.2014


ख़्वाब

जैसे कोई ख़्वाब पलकों को छू कर लौट जाय
जैसे कोई बंजारा अपनी ही मंज़िल से गुज़र जाय
जैसे कोई दरिया समन्दर में जा कर खो जाय
तुम और मैं ऐसे ही तो हैं ............

जैसे कोई ओस की बूँद हरे पत्तों की गोद में छुप जाय
जैसे किरण हरी दूब से लिपट कर चटकीली हो जाय
जैसे कोयल की कूक मधुमास के आगमन का एहसास जगा जाय
तुम और मैं ऐसे ही तो हैं ............

जैसे किसी मासूम की खिलखिलाहट हृदय को भा जाय
जैसे किसी रात के काजल को चाँदनी धुँधला कर जाय
जैसे बारिश की बूँदें बरस कर चन्दन सी शीतलता से मिला जाय
तुम और मैं ऐसे ही तो हैं ............


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