अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
02.05.2015


बेटी

कोख कहती मेरी मैंने तो संतान जने हैं
बेटा बेटी कहकर तुमने ये कैसे ताने बुने हैं

सींचा है रक्त से दोनों को ही मैंने
नौ मास रात दिन मैंने जिसमे सपने बुने हैं

इक को धरती स्वरुप दिया इक को अम्बर
नही अकेले संसार दोनों के साथ ही चले हैं

फिर क्यूँ बेटी धूमिल बेटे को शान कहे हैं
क्यूँ सबने मिलकर माँ के कोख का अपमान किये हैं
फिर क्यूँ बेटे की ख़ुशी पर बेटी का बलिदान किये हैं


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें