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ISSN 2292-9754

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12.17.2014


बंद घड़ी

"वन साइडेड लव.....!" अचम्भित हो कर पलक ने आकाश से कहा, "एक तरफ़ा प्यार ....

अच्छा ...तो अब ....वैसे ठीक ही कह रहे होगे तुम ...लेकिन मेरी नज़र में तो प्यार बस प्यार है, वो एक तरफ़ा या दो तरफ़ा नहीं होता... प्यार तो एक एहसास होता है जो दो दिलों को जोड़ता है, इसमें गुड लुकिंग, समार्टनेस, अमीरी-गरीबी कहाँ दीखता है.. और फिर तुमने कब मुझे फ़ोर्स किया कि मैं तुमसे ही प्यार करूँ? ...ये फैसला तो मेरा था। और सच पूछो तो प्यार में दिल पर कोई फैसला चलता भी कहाँ है? ...तो तुम आज़ाद हो, ये सब कुछ मेरा है ..मेरी भावनाएँ, मेरे एहसास। जो तुमसे मैंने ख़ुद को जोड़ रखा था तुमने तोड़ दिया तो क्या? ....मैं नहीं तोड़ सकती ...मुझसे नहीं होगा ये सब। तुम जाओ अब ....भगवान के लिए चले भी जाओ यहाँ से ...मुझे मेरी ख़ामियाँ या खूबियाँ न बताओ! ..तुम्हें तो पता है मैं ख़ुद की पसंदीदा हूँ और अपनी ही नज़रों में मैं ख़ुद को कमज़ोर या टूटते नहीं देख सकती। ...जिस प्यार को मैं ताकत मानती थी उसी प्यार से ज़ख्म पाने का एहसास ...नहीं नहीं ये सच मैं नहीं स्वीकार कर सकती! ....तुमसे कब मैंने उम्मीद की कि तुम मुझे प्यार करो और हाँ तुम मुझे रोक भी नहीं सकते। ..मैं और मेरा दिल जो चाहेगा मैं वही करूँगी," .....रोते रोते एक साँस में सारी बातें पलक ने आकाश से कह डाली। आकाश पलक की आँखों में आँसू छोड़ वहाँ से चला गया।

पलक की नज़र तभी अपनी अलमारी में रखे एक तोहफ़ों से भरे डिब्बे पर पड़ी जिसे उसने निकाला। उसमें छोटे-छोटे तोहफ़े जो आकाश ने दिए थे उन विशेष दिनों पर जब सभी एक दूसरे को देते हैं, रखे थे। .....हर तोहफ़े के साथ उसकी यादें जुड़ी थीं। ...पलक ने एक-एक कर हर तोहफ़े को देखा, उन तोहफ़ों में एक घड़ी भी थी जो बंद थी। पलक ने घड़ी निकाल कर डिब्बे को बंद करके वापस उसे उसी जगह रख दिया।

कालेज के दिनों में बिना पलक के आकाश का कोई काम नहीं होता था। सारा दिन एक साथ दोनों गुज़ारते थे। घर पहुँचने पर मोबाइल ऑन हो जाता था। दोनों के परिवार वालों को भी कभी आपत्ति नहीं हुई थी उनकी दोस्ती पर। फिर आज ...इस तरह का आकाश का बर्ताव .....क्यूँ? क्या हो गया उसे? सोच कर पलक रोती रही।

पलक को मास्टर्स करने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो से स्कॉलरशिप मिल गया था और कुछ ही दिनों में वह अमेरिका चली गयी। धीरे धीरे 15 साल गुज़र गए और पलक को वहाँ एक बहुत ही अच्छी कम्पनी में नौकरी मिल गयी थी और बीते समय के साथ वहाँ की नागरिकता भी मिल गयी थी। पलक वहाँ के रंग-ढंग में रच-बस गयी थी पर दिल के किसी कोने अब भी उसकी दुनिया वैसे ही थी जिसे वह अपने साथ ले आई थी।

पनी में मैनेजिंग डायरेक्टर थी उस कंपनी ने अपनी एक शाखा भारत में भी खोल रखी थी। कम्पनी ने कुछ एम्प्लोयिज़ को ट्रेनिंग देने के लिए अमेरिका बुलाया था, जिनमें एक एम्प्लोयी आकाश भी था। ट्रेनिंग को 10 दिन बीत चुके थे। वीकेंड पर कंपनी की ओर से पार्टी थी, इसमें सभी शामिल हुए थे। आकाश अपने यूनिट के साथ पार्टी के मज़े ले रहा था कि उसे अचानक पलक दिखाई दी जो कम्पनी के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ थी। आकाश को बहुत हैरानी हुई पलक को यहाँ देखकर। ....पूछने पर पता चला कि पलक इस कम्पनी की मैनेजिंग डायरेक्टर है। पलक पार्टी में सभी से मिल रही थी अब बारी आकाश की थी।

"गुड इवनिंग मैडम ...माय नेम इज़ आकाश," .... आकाश ने पलक की ओर हाथ बढ़ाते हुए उससे कहा। गुड इवनिंग ...कह कर पलक आगे निकल गयी और दूसरे सदस्यों से मुलाकात करने लगी।

दूसरे दिन आकाश पलक के घर का पता लेकर उसके घर जा पहुँचा। कॉल बेल बजाने पर पलक ने दरवाज़ा खोला।

"तुम, तुम यहाँ कैसे आकाश? और मेरे घर का पता तुमको किसने दिया?? अच्छा ....आओ ..अन्दर आओ बाहर बर्फ गिरने के कारण काफी ठण्ड है। बैठो ....कॉफ़ी लोगे या चाय?"
"कुछ भी चलेगा..," आकाश ने मुस्कुराकर कहा। पलक दो कप कॉफ़ी और कुछ स्नैक्स ले कर आयी और बैठ गयी।
"आपको देख कर आपसे मिलने का मन हुआ तो ख़ुद को रोक न पाया। ऑफिस से आपके घर पता लिया और यहाँ चला आया। ऑफिस में बिना काम के मैं कैसे मिलता और अब तो तुम हमारी बॉस हो तो," .....आकाश ने मुस्कुरा कर पलक से कहा।

"वैसे तो सालों पहले हमारे मिलने की सारी वज़ह ही ख़तम हो चुकी थी तो अब ...अब क्या? ...पलक ने आकाश से कहा, "वैसे भी मैं किसी अमीर खानदान से तो थी नहीं जो दोस्त दूर तक मेरा साथ निभाते। तुम ..तुम नौकरी कर रहे हो ..मैं तो सोच रही थी कि तुम कई कम्पनियों के मालिक होगे।"

आकाश ने कहा, "शादी के बाद ही सब ख़तम हो गया था। वज़ह ये थी कि मैं लोन नहीं भर पाया और धीरे-धीरे सब ख़तम हो गया ...अब ..मैं एक छोटे से फ्लैट में अपनी फ़ैमिली के साथ रहता हूँ।"

"सुन कर बहुत अफ़सोस हुआ," ..पलक ने आकाश से कहा।

"तुम्हारी फ़ैमिली में कौन-कौन है? सॉरी मेरा मतलब था आपकी फ़ैमिली में," ..आकाश ने पलक से पूछा।

पलक मुस्कुरायी ...एक लम्बी साँस छोड़ते हुए.....झुक कर कप को टेबल पर रखा और बोली, "वही जिन्हें मैं अपने साथ ले आई थी अब भी मैं उन्हीं के साथ हूँ।

आकाश तुम मुझे तुम ही कह कर संबोधित कर सकते हो .....तुम्हारे मुँह से आप अच्छा नहीं लगता ...।"
आकाश ने पलक के हाथ वही घड़ी देखी जो उसने वर्षों पहले उसे उपहार स्वरूप दिया था।

"अरे ये तो वही घड़ी है जिसे मैंने तुमको तुम्हारे जन्मदिन पर दिया था। वो भी जब हम दोनों साथ पढ़ते थे। ये घड़ी चलती भी है?? और आज भी तुम इस घड़ी को ......"

पलक ने आकाश की बात को बीच में रोकते हुए कहा, "आकाश जिस दिन हम आखिरी बार मिले थे घड़ी तभी से बंद है।"

"बंद घड़ी पहनने से क्या फायदा पलक?" आश्चर्य से आकाश ने पलक से पूछा।

"आकाश मेरे लिए वक़्त उसी दिन ठहर गया था जब तुम मुझे छोड़ गए थे .....ये घड़ी आज भी मेरे साथ है मेरे एक तरफ़ा प्यार की तरह एक याद बन कर, मेरी हिम्मत बन कर, मैं बंद घड़ी बदलना ही नहीं चाहती क्यूँकि मैं उस पल से बाहर आना ही नहीं चाहती। और आज मैं इन सब के साथ बेहद ख़ुश हूँ। शायद इस घड़ी की वज़ह से मुझे कभी किसी की ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई।

आकाश तुम्हें देर हो रही है तुम्हें जाना चाहिए अब," .......पलक ने आकाश से कहा।

"हाँ ...पलक।

वक़्त क्या हुआ है पलक?"

पलक ने बंद घड़ी की ओर देखा और कहा 10 बज रहे हैं रात के।"

आकाश को यकीं न हुआ उसने अपना मोबाईल निकाल कर टाइम चेक किया 10 ही बज रहे थे।

बंद घड़ी से सही वक़्त .....तुम कितनी अलग थी ...आज भी तुम वैसी ही हो ....सबसे अलग .....मैं तुम्हें क्यूँ पहचान न सका.... तुम हमेशा की तरह शांत अपने निर्णय के साथ अटल ....वक़्त ....कितना बदल गया ....नहीं बदली तो तुम मैं... मैं एक झटके में अमीर बनने का ख़्वाब ले कर तुम्हें झुठलाकर तुमसे आगे निकलने चला था आज मेरे पास सिर्फ पछतावा है सब कुछ होते हुए भी .....

ज़िन्दगी की कडवाहट को सोचते हुए आकाश अपने होटल तक आ चुका था ............


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