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ISSN 2292-9754

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12.17.2014


अमलतास

छुवन तुम्हारे शब्दों की
उठती गिरती लहरें मेरे मन की
ऋतुएँ हो पुलकित या उदास
साक्षी बन खड़ा है मेरे आँगन का ये अमलतास

गुच्छे बीते लम्हों की
तुम और मैं धार समय की
डाली पर लटकते झूमर पीले-पीले
धूप में ठंडी छाया नहीं मुरझाया मेरे आँगन का अमलतास

सावन मेरे नैनों का
फाल्गुन तुम्हारे रंगत का
हैं साथ अब भी भीगे चटकीले पल
स्नेह भर आँखों में फिर मुस्काया मेरे आँगन का अमलतास


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