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ISSN 2292-9754

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03.15.2017


साहित्य और बाज़ारवाद

हिंदी साहित्य विकास के अब तक के कालखंड को देखने के पश्चात कुछ विद्वान अब ऐसा भी मान रहे हैं कि वर्तमान युग साहित्य जगत के लिए संक्रति काल है। जिस साहित्य को आज का पाठक पढ़ रहा है वह निरंतर मूल्यहीनता की ओर अग्रेसर हो रहा है। प्राचीन साहित्य से लेकर वर्तमान साहित्य तक एक दृष्टिक्षेप डाला जाए तो न सिर्फ़ काल का अंतर स्पष्ट हो जाता है, बल्कि साहित्य के कथ्य और तथ्य में भी गहरा अंतर महसूस किया जा सकता है। प्राचीन काव्यशास्त्र या साहित्यशास्त्र में काव्य निर्मिती के कारणों की चर्चा की गयी है। प्राचीन आचार्यों ने साहित्य निर्मिती के मुख्य उद्देशों को स्पष्ट करते हुए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की अवधारणा को सामने रखा था। प्राचीन काल में साहित्य सृजन के पीछे तथा साहित्य पठन या अध्ययन के पीछे धर्म की भावना प्रधान थी। इसी धर्म से जुड़कर मोक्ष की भावना को स्वीकारा गया। चार वेद उपनिषद, आरण्यक, रामायण, महाभारत जैसी हमारी संस्कृति की धरोहर के रूप से रचना हो रही थी। इस साहित्य में जीवन की वास्तविकता को सकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया। कुप्रवृत्तियों के नाश, आचरण में सदाचार, विनय जैसी सदप्रवृत्तियों की ओर बढ़ानेवाला यह साहित्य था। तत्कालीन सहज जीवन मूल्यों की झलक उस साहित्य में देखी जा सकती है। अत: सामाजिक व्यवस्था स्थापित करने में साहित्य का योगदान था।

मध्ययुग में मात्र साहित्य की अवधारणा बदल गयी। कहीं कठिन नियमों में बाँधकर साहित्य की आत्मा का हनन हुआ तो कहीं वह इतनी उच्च स्तरीय हो गयी कि सर्वसामान्य समाज के लिए उसे अपनाना दूभर हो गया। साहित्यकारों का श्रेय और प्रेय अर्थ (धन) के इर्द-गिर्द घूमने लगा। साहित्य के द्वारा अर्थार्जन की कल्पना सामने आयी और आश्रयदाताओं प्रशंसकों के अनुरूप साहित्य के कोण बदलने लगे। साहित्य धनिक वर्ग की संपत्ति बन गया। इसी विशिष्ट वर्ग के लिए लिखे गए साहित्य ने अपने प्राचीन मापदंडों को भुला कर धनिकों के निजी निवास, शय्या कक्ष, नयिका सौंदर्य, प्रशस्तियों आदि में अपने-आप को बाँध लिया। श्लीलता की परिधि को लाँघकर पाठकों की काम-भावना जाग्रत करने का वह साधन बन गया। संभवत: नश्वर जीवन के इस एकांगी चित्रण से पूर्ण साहित्य को देख प्लेटो जैसे महान विद्वान ने साहित्य को उसी सीमा तक स्वीकार्य किया था, जहाँ तक वह राज्य के हित के बारे में सोचे। आगे आधुनिक काल तक आते-आते अर्थ और कामभावनाओं की तुष्टि को महत्वपूर्ण मान कर कई साहित्य रचे गये। इसका अर्थ यह नहीं कि अच्छा साहित्य रचा ही नहीं गया। परंतु आधिकतर यही पाया जाता है कि साहित्य सृजन के पीछे की धर्म, मोक्ष की भावनाएँ लुप्त हो गयीं। बदलते परिवेश ने साहित्य के विषयों को भी प्रभवित किया। बढ़ते औद्योगिकरण, भूमंडलीकरण, बाज़ारवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप एक बार तो फिर साहित्य जगत को संकट में डाल दिया था। पर उससे भी उभरकर साहित्य अपने नये रूप, नये विषय तथा नई चुनौतियों के साथ खड़ा हुआ है। परंतु साहित्य का यह पथ किस ओर उन्मुख होता है इसके बारे में कोई आश्वस्त नहीं। वैश्वीकरण की अवधारणा ने विश्व के समस्त मनुष्यों में आमूलाग्र परिवर्तन किए। पद, पैसा, प्रतिष्ठा, पहचान प्राप्त करने के पीछे दौड़ता मनुष्य एक-दूसरे से भाग रहा है। अपने अस्तित्व को बनाने के चक्कर में निजी दयित्वों, मानव मूल्यों, जीवन मूल्यों को ताक पर रख दिया है। नैतिकता से जुड़ी हुई किसी भी सच्चाई को वह स्वीकारना नहीं चाहता। इसी मार्ग में दो तरह के पाठक मिलते हैं, एक वह जो जीवन की वास्तविकताओं से पलायन करता हुआ स्वप्नमयी दुनिया में ही खोना चाहता है। जीवन के अनगिनत हादसों से टकराकर अपने आप को भुलाने के लिए `काम` का सहारा लेता है तथा उसे ही साहित्य में ढूँढता है। साहित्य क्षेत्र में बाज़ारवाद के चलते ऐसे सस्ते मनोरंजक कामोद्दीपक साहित्य की भी कमी नहीं है, जो साहित्य का अवमूल्यन तो करता ही है साथ ही संबंधित देश के सांस्कृतिक स्तर को भी क्षतिग्रस्त करता है।

बाज़ारीकरण की बढ़ती अवधारणा के चलते अधिकतर लेखकों के पास पर्याय न होने के कारण "स्वांत सुखाय या समाज हिताय" की भावना पीछे छूट रही है। आज का लेखक बाज़ारों के लिए लिखता है, उस बाज़ार के लिए जहाँ उसके पास पाठक रूपी उपभोक्ता है। लेखकीय धर्म का व्यावसायीकरण हो रहा है। पाठकों की जैसी माँग होगी वैसा साहित्य लिखा जा रहा है। यूँ कहें तो ग़लत नहीं होगा कि प्रकाशन व्यवसाय भी पाठकों की माँग पर चल रहा है। पाठक जो चाहता है वही छापा जाता है। वास्तविकता के नाम पर समाज में फैली अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, गंदा हो चुका राजनितिक माहौल, सामजिक कुरीतियाँ, छिछलापन साहित्य में उभारा जा रहा है। उस पर यह भी कहा जा रहा है कि साहित्य समाज का प्रतिबिंब होता है, समाज की घटनाओं से साहित्य रूबरू कराता है। सामाजिक सत्य के प्रकटीकरण के साथ वह यदि गुणवत्ता लिए हो तो स्वीकार्य है। पर अक्सर यही देखा जाता है कि साहित्य के द्वारा प्रकट सत्य से विद्रोह की स्थिति तो बनती है पर समाज को वह निश्चित दिशा नहीं दे पाती। दूसरी ओर बाज़ार की माँग की आपूर्ति करनी भी उतनी ही आवश्यक बन जाती है।

साहित्यिक बाज़ारों को लेकर अन्य एक समस्या कई दशकों से उभरकर आ रही है। कोई साहित्यिक रचना अपनी उत्कृष्ट कृति से यदि अजरामर हो जाती है तो पाठकों की माँग उसी रचना के प्रति अधिक होती है। आलोचकों के लिए भी आलोचना का विषय ऐसी विशिष्ट कृतियों तक सीमित हो जाता है जो बाज़ार पर अपना असर करते हैं। दूसरे पहलू से भी यदि देखा जाए तो विशिष्ट साहित्य कृतियों की बिक्री बढ़ाने हेतु बाज़ारों से या स्वयं प्रकाशकों द्वारा आलोचकों की समीक्षाओं की गतिविधियाँ तय की जाती हैं। कई बार किसी लेखक के लिए आलोचक भी पूर्वाग्रह लिए हुए होता है। जिसके कारण अच्छी कृतियाँ बाज़ारों में अपना स्थान नहीं बना पातीं, न पाठकों तक पहुँचती हैं।

कई बार यह भी पाया जाता है कि प्रकाशक अपने लिए आलोचकों के खेमे बनाते हैं। प्रकाशकों के इन खेमों में आलोचकों के कई गुट कार्यरत होते हैं, जो उस प्रकाशन व्यवसाय को फ़ायदा पहुँचाने के लिए अपने-आप को कटिबदध मानते हैं। जिसके फलस्वरूप पाठक वर्ग गुमराह किया जाता है। कुछ प्रसंग ऐसे भी दिखाई देते हैं जहाँ आलोचक किसी कृति की प्रशंसा करते हुए वह थकते नहीं पर पाठक द्वारा ऐसी कृतियाँ अस्वीकार की जाती है। शायद ऐसी घटनाओं के चलते ही पाठक वर्ग अपने आप को साहित्य जगत से विमुख कर रहा है। साहित्य जगत की यह खेमेबाज़ियाँ सिर्फ़ प्रकाशन-आलोचना तक सीमित न होकर लेखकों में भी इस तरह की खेमेबाज़ियों का वातावरण देखने को मिल रहा है। जिसका असर साहित्य और समाज पर भी हो रहा है। परिणाम स्वरूप अच्छा साहित्य पाठकों तक नहीं पहुँच रहा है। कुछ परिस्थितियों में नवोदित अच्छे लेखकों को भी उभरने नहीं दिया जाता, तो कभी परिस्थितियों के चलते विवश होकर, कभी पैसा कमाने कुछ लेखक अपने साहित्य को ग़लत हाथों में भी बेचते हैं। वहीं दूसरी ओर ऐसा साहित्य ख़रीदकर झूठी प्रतिष्ठा पाने तथा अपने आप को साहित्यकार के रूप में बाज़ार में खड़ा करते हैं, साहित्य को व्यवसाय बनाते हैं। इस की पूर्ति हेतु बाज़ारों से अपना तालमेल बैठाते हैं। इन्हीं परिस्थितियों के चलते आज साहित्य की चमकीली दुनिया के बाज़ार में ऐसे कितने ही सरस्वती पुत्र हैं जो लक्ष्मीपुत्रों की ओर विवशता से देख रहे हैं और छद्म नाम ग्रहण कर जीविका अर्जन की कोशिश कर रहे हैं। क्या यह स्थितियाँ साहित्य जगत के घोटालों की सच्चाईयों को उजागर नहीं करतीं? अत: शुद्ध साहित्यिक मसिजीवी जो केवल साहित्य के आधार पर जी रहा है केवल उँगलियों पर गिनने मात्र शेष रह चुके है। अच्छे साहित्य में भेदभाव की यह प्रवृत्ति केवल कुछ सहित्यिक मंडलों तक सीमित नहीं बल्कि इसकी जड़ें शासन व्यवस्था तक पहुँच चुकी हैं। जिससे कई सुयोग्य साहित्यकार शासन दरबार में जीवन-भर उपेक्षित रहते हैं। अपने सृजन से साहित्य भारती का भंडार भरने वाला जीवन के अंतिम क्षणों तक जीवनावश्यक वस्तुओं से अपने घर के भंडार भी नहीं भर पाता। रॉयल्टी के चलते अपने साहित्य को कुछ दामों में ही प्रकाशकों को बेचा जाता है।

वर्तमान स्थिति देख यह तो ज्ञात होता है कि परिवर्तन की आँधी साहित्य क्षेत्र में भी चली। अनेक कठिनाइयों के चलते श्रेष्ठ साहित्य अन्तरजाल के कारण पाठक तक पहुँच रहा है। सस्ते साहित्य को पढ़ने वाले हैं, तो स्तरीय साहित्य को पुरस्कृत करनेवाले भी हैं। कई बार यह भी देखने को मिलता है कि देश में जिस साहित्य को किसी ने पहचान नहीं दी, विदेशों में उसे सराहा गया है। मीडिया, सूचना-प्रौद्योगिकी, फ़िल्म, विज्ञापन इन बाज़ारवाद के विकल्पों के चलते भी साहित्य को अच्छे दिन आ रहे हैं। अच्छे साहित्य पर कई फ़िल्में बनाई जा चुकी हैं और भी बनाई जा रही हैं। बाज़ारवाद के चलते प्रकाशन व्यवसाय में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इन सब के चलते पाठकों की रुचि का ध्यान उन्हें रखना भी आवश्यक हो गया है। अत: श्रेष्ठ साहित्य की खोज में प्रकाशन व्यवसाय भी है।

हिंदी साहित्य के बारे में बात की जाए तो साठोत्तरी काल में प्रकशित हुए अधिकतर साहित्य में कुंठा, निराशा, वैफल्य, पराभूत मनोवृत्ति के दर्शन होते हैं। परंतु वर्तमान स्थिति में ऐसे साहित्य की माँग बढ़ रही है, जो पलायनवादी मनोवृत्ति, निराशा को झटक कर जीवन में उम्मीद की नई रोशनी दे तथा जीवन के प्रति आधुनिक पर वास्तववादी, नैतिक और विज्ञानवादी दृष्टि दे। साहित्य के बदलते परिमाणों के चलते बाज़ार अब ऐसे साहित्य का है, जिसमें केवल सौंदर्य का छिछलेपन नहीं बल्कि जो मनुष्य की अंतश्चेतना को झकझोर दें। न कि उसे किसी भ्रम में रखे। ऐसी पुस्तकों की माँग भले ही बढ़ रही हो पर बाज़ारों में इनकी कमी है।

फिर भी अंत में यही कहा जा सकता है कि आज की समय की माँग को देखते हुए साहित्य और बाज़ार एक-दूसरे पर निर्भर है।

डॉ. चौधारे श्वेता बाबुलाल,
सहायक प्राध्यपिका,
कला, वणिज्य व विज्ञान महाविद्यालय,
सोनई, अहमदनगर - 414105


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