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ISSN 2292-9754

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03.06.2016


मौन-ममता

एक बार फिर हार हुई
माँ-ममता में दरार हुई
वो ज़ोर का प्रहार था,
आवाज़ बस नहीं हुई
अपमान के अंगार को
माँ ने नयन में भर लिया
रोई बहुत सिहर-सिहर
पर चीख बस नहीं हुई
भ्रूण के विलगाव से
ममता तड़प कर रह गई
प्रेम का बलिदान कर
माँ-देह फिर एक हो गई
माँ अपने इतिवृत्त के
केंद्र पर खड़ी हुई
अश्रुजल पीती हुई
मौन को सुनती गई
एक आस लिए हुए
पथ पर चलती गई
विजय-पथ की पगडण्डियों में
हार के ही कण बिछे हैं
हार की संवेदना में
विजय के सपने छिपे हैं
आज अपमानित हुई
तो क्या?
कल सत्य का
सम्मान होगा
देर से ही सही
पर पुत्री का
विजय-श्रृंगार
अवश्य होगा॥


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