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ISSN 2292-9754

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03.23.2016


होली

कभी कभी लगता है, क्या है,
सच में क्लेश मिटा दो न।
भूल सभी बिगड़ी बातों को,
मन से द्वेष हटा दो न।

कटुता कटुता रखते रखते,
कितने कड़वे हो गए हम,
चलो आज पी प्रेम पियाला,
कड़वाहट बिसरा दो न।

हर होली पर झूठे झूठे,
मिलते कितने थक गए हम,
चलो आज की होली से ही,
सच का रंग लगा दो न।

होली तो मन की बोली है,
तन रँगते रँगते क्या होगा,
मन-हाथों से विष-थाल हटाकर,
प्रेम रंग बरसा दो न।

इसका, उसका, तेरा, मेरा,
सब कितना बेमानी है।
शिव-होली को खेल कृष्ण बन,
जीवन दर्शन समझा दो न।


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