अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.30.2016


भारत तुम्हारी नारी की व्यथा

समाज के वे तिरस्कार
अपनों की कटु बोलियाँ
अभाव-भाव, और स्वभाव
कितनी विषम परिस्थितियाँ
कैसे मेरे ज़िंदा रहने की चाह के पीछे पड़े हैं,
सदियों से मौन हम कण्टकों के पथ पर खड़े हैं॥

कभी-कभी टूटती मौन-तंद्रा
समाजों में ज्वार आए
करोड़ों में बस एक कोई
शक्ति स्वरूपा कहलाए
अबला नहीं हो के असत्य स्वर भरे पड़े हैं,
सदियों से कौन हमॽ खोज पाने में अड़े हैं॥

प्रारब्धों को कोसते तुम
आत्मग्लानि से भरी मैं
अपमान क्या तुम्हारा करूँगी
स्वयं सम्मानों से डरी मैं
आराध्य मानकर तुम्हारी पूजा करती रही हूँ
प्रारब्ध और अपमान की सीमाओं से भी परे हूँ

मृत्यु का वरण मुझे
अब दुष्कर-दूभर नहीं
हर रोज़ के हर निमिष
मौत से कुछ कम नहीं
हा! समाज तुम मुझे जीने देते नहीं हो,
और मेरी ममता मुझे मरने देती नहीं है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें