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ISSN 2292-9754

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03.12.2018


दुआएँ

पेट नही भर सकतीं दुआएँ
अगर भर सकतीं तो,
यहाँ कोई....
परेशान न होता,
वृद्धाश्रम न होता,
भिखारी न होते,
बेरोज़गारी न होती,
सम्प्रदायिकता की बीमारी न होती,
बात बात पर झगड़े न होते,


होता यूँ कि
जब भी कोई परेशान होता
माँ की गोद मे सर रख के
दुआ माँग लेता,
माँ बाप भगवान होते,
भीख की जगह हक़ होता,
बिना काम के भी इंसान चैन से सोता,
ईश्वर बाँटा नहीं जाता मज़हबों में,
सबमें भाईचारा होता।

सोचो दुआओं में ताक़त होती तो,
कैसा होता?


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