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ISSN 2292-9754

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08.25.2017


बीए पास

ये अचानक मुझे क्या हुआ? बहुत धोखा हो गया, ऐसी तो हालत कभी न थी। सब कुछ तो है कमी क्या है मुझे? सब है बीवी,बच्चे इतना सुखी छोटा सा परिवार जिसे अपर्णा ने इतने प्यार से दुलार से अपनेपन से सहेज के रखा है। बिल्कुल उसी तरह जैसे तिनकों-तिनकों से सँवारती है चिड़िया अपने घोंसले को। फिर उसी घोंसले को छोड़ उड़ जाती है। मगर अपर्णा मेरी हर ग़लती को भुला देती है और फिर जुट जाती है सँवारने में अपना घोंसला।

घड़ी की सुईयाँ भी इतनी पाबंद नहीं होंगी जितनी कि अपर्णा। बिना बैटरी के घड़ियाँ बंद हो सकती हैं मगर अपर्णा बीमार हो तो भी नहीं रुकती; चलती रहती है लगातार। फिर मुझे ऐसा क्यों हो रहा है।

मैं अनायास ही लौटता जा रहा हूँ उस बीते हुए कल में। कुछ भूलें कितनी भारी, कितनी असहनीय हो जाती हैं। ये तो मैंने अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार ली है।

नहीं! नहीं! कुछ भी हो इस द्वंद्व से तो बाहर आना ही होगा। मैं अपनी ग़लती की सज़ा किसी और को नहीं दे सकता। अब मेरी शादी हो चुकी है। यही सोचते-सोचते सलिल पुरानी यादों में खो गया जब उसने पहली बार अपर्णा को देखा था।

गाँव की एक शादी में इतनी लड़कियों के बाद भी उसकी निगाह अपर्णा पे टिक गई। अपर्णा थी ही इतनी ख़ूबसूरत। फिर क्या था, जुगत शुरू हुई नंबर लेने की। आजकल के समय में नंबर मिलना मुश्किल भी कहाँ है। नंबर मिलते ही बातों का सिलसिला ऐसा चला कि फिर शादी पे आकर ही रुका। तब तो दिन-रात बातें होतीं मगर अब तो अपर्णा घर और बच्चों में इतना उलझ गई है कि उसके पास अपने लिए भी फ़ुरसत नहीं है।

"सर, बॉस ने ये फ़ाइल भेजी है," किसी की आवाज़ आयी।

सलिल ने चौंककर कहा, "हाँ रख दो टेबल पे।"

उफ़्फ़! आज तो बहुत देर हो गयी लंच टाइम कब बीत गया पता नहीं चला। कुछ खा कर आता हूँ।

कैंटीन जाते वक़्त सलिल की नज़र अनायास ही शोभा के कैबिन की तरफ़ चली गयी। शोभा कुछ उलझी थी उसके भाव बता रहे थे कि वो कुछ परेशान है। मगर सलिल ने अपने काम से काम रखना बेहतर समझा और कैंटीन की तरफ़ मुड़ गया।

अभी तो तीन ही महीने बीते थे शोभा को आये मगर आधा ऑफ़िस उसी पे डिपेंड हो गया है। कोई काम किसी का भी अटका तो "मिस शोभा व्हाट शुड आई डु"? मैं भी सोच में हूँ कि ऐसा क्या है शोभा में, जब मैंने इसे फोटो में देखते ही शादी के लिए मना कर दिया था तब तो मुझे इसमें ऐसी कोई बात नज़र नहीं आई। इसने तो शायद मुझे जाना भी न हो। जानेगी भी कैसे बुझे-बुझे से इसके पिता जी गाँव भर में लड़के ही तो ढूँढ़ते थे; इसे क्या पता कि बेचारी को किसने मना किया। शायद शोभा नहीं उसके पिता ही उसकी शादी न होने का कारण थे। क्योंकि वो जिस तरह की लाचारगी दिखाते, लगता कि कोई बेटी नहीं किसी ऐसे समान को बेचना चाह रहे हों, जो उनके घर में फ़ालतू में पड़ा हो।

तभी तो पिता जी ने इनको लताड़ा था, मैंने भी क्या-क्या नहीं बोला था। हमें पढ़ी लिखी लड़की चाहिए, आपकी लड़की बीए पास भी नहीं। पढ़ा नहीं सकते, पाल नहीं सकते तो बेटियाँ पैदा ही क्यों करते हो। और जाने क्या अनाप-शनाप। पिता जी ने तो यहाँ तक कह दिया था कि आपकी लड़की बोझ है बोझ ही रहेगी जीवन भर। कभी-कभी तो लगता है कि लड़के-लड़कियों का ये फ़र्क हम जैसों की वजह से कभी कम नहीं होता।

आज पूरा एक साल बीत गया, इस बीच सलिल और शोभा कई बार आमने-सामने आए। कुछ इम्पोर्टेन्ट डिस्कशन भी हुए मगर कभी घर-परिवार की बातें नहीं हुईं। हालाँकि सलिल ये जानने को हमेशा उत्सुक रहता कि क्या हुआ उसके साथ कैसे वो यहाँ तक पहुँची?

आज सुबह से ही ऑफ़िस में रोज़ से ज़्यादा चहल-पहल थी। हर कोई आता ऑफ़िस, कैबिन में बैग रखता और तुरंत पहुँच जाता शोभा के कैबिन में। मैंने भी एक से पूछ लिया क्या बात है भाई आज कुछ ख़ास है क्या, तो उसने कहा, "आपको नहीं पता चला, मिस शोभा का प्रमोशन हो गया है।"

मेरी तो स्थिति ऐसी कि काटो तो खून नहीं। पाँच सालों में मैं वहीं का वहीं और यहाँ एक साल में ही ये प्रमोशन। हालाँकि मैं मन ही मन जानता था कि इस डूबते ऑफ़िस को सँभालने में शोभा ने बहुत मेहनत की है। मगर फिर भी पुरुष का अहम है, आख़िर ऐसे कैसे स्वीकार कर ले।

प्रमोशन पार्टी में ऑफ़िस में अपनी वाइफ़ और बच्चों के साथ सलिल मिस शोभा को बधाई देने गए। और अपनी फ़ैमली से मिलाने लगे।

बच्चों को ख़ूब प्यार करने के बाद तब मिस शोभा ने सलिल जी की तरफ़ देख कर कहा कि आपकी बेटी बहुत प्यारी है इसे बोझ मत बनने दीजियेगा। बीए से आगे पढ़ाइयेगा। उनकी इतनी बात सुनते ही सलिल आवक रह गया। इन्हें तो सब पता...

उसके बाद ऑफ़िस के अन्य लोग उन्हें बधाई देने आ गए।


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