अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
04.05.2008
 

लो आ गई बैसाखी……..
शोभा महेन्द्रू


खेतों में चमक उठा सोना
महका दिल का हर एक कोना
क्यों ना नाचे ये मन बार-बार
कड़ी मेहनत ने दी ये बहार
किया धरती ने सोलह श्रृंगार
चमचमाते नयन बार-बार

धानी चूनर में मोती सजे हैं
ढोल ताशे और बाजे बजे हैं
दिल की वीणा के झंकृत हैं तार
झूमें गाए है मन बार-बार
हुए आँखों के सपने साकार
फिर से जागी उम्मीदें हज़ार

अब प्रिया भी हुई है उदार
लेके आए वो सोने का हार
उनके गालों की रंगत जो देखूँ
बिन पिए ही चढ़े है खुमार
तेरी पूरी करूँ हर तमन्ना
दे मुझको तू बाँहों के हार

आज दिल में उमंगें वो छाई
देखा नयनों में उनकी जो प्यार
आओ झूमें और नाचें बार-बार
रोज आता नहीं ये त्योहार


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें