हम और तुम
सदैव एक दूसरे
की ओर आकर्षित
कभी तृप्त, कभी
अतृप्त
कभी आकुल, कभी व्याकुल
किसी अनजानी कामना से
बढ़ते जा रहे हैं ----
मिल जाएँ तो विरक्त
ना मिल पाएँ तो अतृप्त
कभी रुष्ट, कभी सन्तुष्ट
कामनाओं के भँवर में
उलझते जा रहे हैं --
सामाजिक बन्धनों से त्रस्त
मर्यादा की दीवारों में कैद
सीमाओं से असन्तुष्ट
स्वयं से भी रुष्ट
दुःख पा रहे हैं --
निज से भी अनुत्तरित
विचारों से परिष्कृत
हृदय से उदार
भीतर से तार-तार
कहाँ जा रहे हैं ?
चलो चलें कहीं दूर
जहाँ हो उसका नूर
निःशेष हो हर कामना
कभी ना पड़े भागना
सारे द्वन्द्व जा रहे हैं--
मन वृन्दावन हो जाए
वो ही वो रह जाए
सारा संशय बह जाए
बस यही ध्वनि आए
सुःख आ रहे हैं --