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03.22.2008
 

हम और तुम
शोभा महेन्द्रू


हम और तुम
सदैव एक दूसरे
की ओर आकर्षित
कभी तृप्त, कभी अतृप्त
कभी आकुल, कभी व्याकुल
किसी अनजानी कामना से
बढ़ते जा रहे हैं ----

मिल जाएँ तो विरक्त
ना मिल पाएँ तो अतृप्त
कभी रुष्ट, कभी सन्तुष्ट
कामनाओं के भँवर में
उलझते जा रहे हैं --

सामाजिक बन्धनों से त्रस्त
मर्यादा की दीवारों में कैद
सीमाओं से असन्तुष्ट
स्वयं से भी रुष्ट
दुःख पा रहे हैं --

निज से भी अनुत्तरित
विचारों से परिष्कृत
हृदय से उदार
भीतर से तार-तार
कहाँ जा रहे हैं ?

चलो चलें कहीं दूर
जहाँ हो उसका नूर
निःशेष हो हर कामना
कभी ना पड़े भागना
सारे द्वन्द्व जा रहे हैं--

मन वृन्दावन हो जाए
वो ही वो रह जाए
सारा संशय बह जाए
बस यही ध्वनि आए
सुःख आ रहे हैं --


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