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06.30.2008
 

एक पाती
शोभा महेन्द्रू


दिल की कलम से
लिखती हूँ रोज़
एक पाती नेह की
और तुम्हें बुलाती हूँ

पर तुम नहीं आते
शायद वो पाती
तुम तक जाती ही नहीं
दिल की पाती है ना-

ना जाने कितनी बार
द्वार खटखटाती होगी
तुम्हें व्यस्त पाकर
बेचारी द्वार से ही
लौट आती होगी

तुम्हारी व्यस्तता
विमुखता लगती है
और झुँझलाहट
उस पर उतरती है

इसको चीरती हूँ
फाड़ती हूँ
टुकड़े-टुकड़े
कर डालती हूँ

मन की कातरता
सशक्त होती है
बेबस होकर
तड़फड़ाती है

और निरुपाय हो
कलम उठाती है
भावों में भरकर
पाती लिख जाती है

ओ निष्ठुर !
कोई पाती तो पढ़ो
मन की आँखों से
देखो----
तुम्हारे द्वार पर
एक ऊँचा पर्वत
उग आया है

मेरी पातियों का
ये पर्वत--
बढ़ता ही जाएगा
और किसी दिन
इसके सामने
तुम्हारा अहम्
बहुत छोटा हो जाएगा


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