शोभा महेन्द्रू
कविता
अमर प्रेम…… एक अहसास एक पाती कवि तुम पागल हो--? प्रेम उत्सव फागुन के रंग माँ तुम .... मैं एक अध्यापिका हूँ लो आ गई बैसाखी…….. लोकतंत्र हम और तुम