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ISSN 2292-9754

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03.19.2016


सोशल साईट्स और लोकव्यवहार

ये आलेख फ़ेसबुक और उस जैसी तमाम सोशल साईट्स पर और वास्तविक जीवन में हमारे व्यवहार और चर्चित विषयों पर हमारी प्रतिक्रिया - दोनों के अंतर को समझते हुए लिखा गया है। ठीक वैसे ही जैसे फ़ेसबुक या ट्वीटर पर कोई स्टेटस अपडेट करना और उसे फॉलो करना; दोनों में बहुत फ़र्क होता है। क्या जो हम लिखते हैं उसे मानते भी हैं? अपनाते भी हैं? या सिर्फ़ मित्रों के समक्ष अपनी बुद्धिमानी का खोखला प्रदर्शन कर likes बटोरने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी ये वास्तविक नहीं प्रवचन जैसा सा प्रतीत होने लगता है। साथ ही ये भी जानने और समझने योग्य बात है कि कुछ विशेष मुद्दों या ख़ास विषय पर चर्चा, परिचर्चा जिस अभिव्यक्ति के साथ हम फ़ेसबुक या उस जैसी सोशल साईट्स पर करते हैं, जिन आत्मीय शब्दों का प्रयोग औपचारिक रूप से हम दूसरों के साथ फ़ेसबुक पर करते हैं, क्या वास्तविक जीवन में भी उतने ही धैर्य, बुद्धिमानी और व्यवहारिकता से बातचीत कर पाते हैं?

सोशल नेटवर्किंग साइट्स वर्तमान समय में विचार-विमर्श की प्रक्रिया को नवीनता देने के साथ-साथ हर व्यक्ति के अपने समय की उपयोगिता और महत्व को भी प्रदर्शित कर रही हैं। जैसे कुछ लोग हर मिनट की जानकारी फ़ेसबुक पर अपडेट करते हैं, कुछ लोग दिनों की और कुछ महीनों की। कुछ लोगों के लिए ये सिर्फ़ मनोरंजन का साधन है, कुछ के लिये समय व्यतीत करने का एक बेहतर साधन, कुछ के लिये अपने अकेलेपन को दूर करने की एक ज़रूरत। उसी तरह कुछ लोगों के लिए ज़्यादा से ज़्यादा नए-नए लोगों को जानने और उनसे मित्रता करने का उत्साह और ख़ुशी भी है; मतलब हज़ारों तक फ्रेंड लिस्ट होना उनके लिए बेहद गर्व की बात है। कुछ के लिए ये सामाजिक रूप से चिर-परिचितों या मित्रों के साथ न सिर्फ़ सूचनाओं का आदान-प्रदान बल्कि अपने सुखद और दुखद अनुभवों को बाँटने का भी एक माध्यम है। कुछ के लिए लोक-विमर्श के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाने का माध्यम भी; जिससे किसी भी स्तर के सामाजिक बदलाव की अपेक्षा भी की जा सकती है, क्योंकि कई बार सामाजिक परेशानियों पर अलग-अलग समाधान सलाह के रूप में और कभी-कभी सहयोग भी मिल जाता है। वे लोग जिन्हें हम सिर्फ़ अपने काम तक ही जानते हैं, उनके जीवन के दूसरे पहलू और नए व्यक्तित्व की झलक भी देखने को मिल जाती है; उनको क़रीब से जानने का अवसर भी मिलता है। कुछ लोग शायद इसलिए भी फ़ेसबुक, ट्वीटर या अन्य साधनों का उपयोग करते हैं क्योंकि वो जीवन में स्वयं को अकेला महसूस करते हैं। उन्हें अपनी ख़ुशियाँ, दुःख या उपलब्धियाँ बाँटने के लिये कुछ अच्छे दोस्तों की ज़रूरत होती है; इससे ज़्यादा और बड़ा कारण उनके लिए नहीं होता। ऐसे लोगों की फ्रेंड लिस्ट बेहद छोटी और सलेक्टिव भी होती है पर वो ख़ुश रहते हैं उससे।

फ़ेसबुक या उस जैसी सोशल साईट्स पर हम जिन विषयों पर चर्चा- परिचर्चा या विमर्श करते हैं और कई बार वाद-विवाद भी कर लेते हैं, उनके लिए क्या ज़मीन की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहते हैं? या ये सिर्फ़ फ़ेसबुक स्टेटस अपडेट करने मात्र के लिए होता है? क्या वास्तविक जीवन में भी हम इन विषयों को लाइक कर गंभीरता से लेते हैं? कई बार मुद्दे हमारे आसपास के ही होते हैं और कई बार हमारे अपने जीवन से भी जुड़े होते हैं परन्तु हम अपने जीवन में उन्हीं मुद्दों से या परेशानियों से जूझ रहे होते हैं, जबकि फ़ेसबुक पर बड़ी बुद्धिमानी से उन पर न सिर्फ़ विचार-विमर्श करते हैं बल्कि एक निर्णायक मोड़ पर भी ले आते हैं। दूसरी ओर हम वास्तविक जीवन में बड़े-बड़े और अहम् फ़ैसले अधूरे ही अधर में छोड़ देते हैं। क्योंकि वो एक जोख़िम भरे साहसिक निर्णय होते हैं जिनके परिणामों का भय हमें उन्हें अधूरा छोड़ने पर विवश करता है।

मेरे पास ऐसे कुछ विषयों के उदाहरण भी हैं जिन पर फ़ेसबुक या अन्य सोशल वेबसाइट्स पर लोग विमर्श करते हुए घंटों बिता देते हैं। कुछ सामाजिक मुद्दे हैं - तलाक़शुदा औरत और उसके जीवन से सम्बन्धित परेशानियाँ और समाधान, स्वच्छता, बाल मज़दूरी, भ्रूण हत्या, आत्महत्या, नशाखोरी, गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार, मानव तस्करी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, ग़रीबी, वृद्धजनों से सम्बंधित मुद्दे, बलात्कार इत्यादि। ये सारे मुद्दे अब आम विषय बनकर चर्चित हो गए हैं। कोई भी औसतन शिक्षित व्यक्ति भी अब इन विषयों पर घंटों भाषण दे सकता है - बेहद उच्च स्तरीय शब्दों का प्रयोग करते हुए। भले ही अपने घर में उपरोक्त परेशानियों में से कोई एक से वो पीड़ित होकर रोज़ कलह करता होगा। परन्तु वैसा विमर्श घर में नहीं होता जैसा कि वो फ़ेसबुक मित्रों के साथ करता है।

हर दूसरा आदमी उपरोक्त में से किसी न किसी परेशानी से जूझ रहा है। अपनों के बीच जहाँ से ये समस्याएँ उपजती हैं और जिनके बीच रहकर वो जीवन जीता है अगर उनके साथ भी उतना ही हार्दिकता, आत्मीयता, सहयोगिता, व्यावहारिकता और आदर के साथ बातचीत करे तो कम से कम इन समस्याओं के होते हुए भी परिवारों में मानसिक शांति तो बरक़रार रहेगी। ये भी महसूस होगा कि सब एक दूसरे की परेशानियों को न सिर्फ़ समझते हैं बल्कि महसूस भी करते हैं और एक दूसरे के साथ हैं। किसी बड़ी समस्या का समाधान हो न हो पर उपरोक्त लिखी सामाजिक समस्याओं में "आत्महत्या" की समस्या ज़रूर कम की जा सकती है। आदमी जब स्वयं को अकेला जूझता पाता है, मानसिक रूप से वो प्रताड़ित होकर या किसी से सहयोग प्राप्ति की नाउम्मीदी के हालात उसे ऐसे क़दम उठाने पर विवश कर देते हैं। ये सिर्फ़ एक उदाहरण है। मुझे लगता है इन विषयों पर हम फ़ेसबुक मित्रों से अगर घंटों बात कर सकते हैं, अपने सुशिक्षित, जाग्रत होने का परिचय दे सकते हैं, हर आदमी के कमेन्ट्स को पढ़कर अपनी उदार प्रतिक्रिया दे सकते हैं तो अपने परिवार या आसपास के लोगों के साथ वास्तविक जीवन में भी ऐसे ही आत्मीय शब्दों का प्रयोग कर उनके दिल में भी जगह क्यों न बनायें। परिवार के सदस्यों के साथ भी सम्मानजनक तरीक़ा अपनाएँ उनके साथ बेरुख़ी और उबाऊपन से तो न पेश आयें। उन्हें ये न एहसास करवाएँ कि वे घर के हैं या आसपास ही रहते हैं, इसलिए उनके साथ बातचीत में ज़्यादा गहरे हार्दिक और आत्मीय शब्दों की आवश्यकता नहीं। जो अपेक्षा आप दूसरों से रखते हैं उसका निर्वहन पहले स्वयं करें और शुरुआत अपने घर से करें।

कभी एक प्रयोग करके देखें। घर में रहकर या घर के बाहर रहकर घर के किसी सदस्य, बच्चे, माता-पिता अगर संभव हो सके तो पत्नी के साथ भी, या पत्नी हैं तो पति के साथ घंटों फ़ेसबुक पर बातें करें, ट्विटर पर बात करें, उनको सुनें, ज़रूरत होने पर सलाह भी दें। ठीक वैसे ही जैसे विचार-विमर्श या परिचर्चा आप फ़ेसबुक मित्रों के साथ करते हैं। बच्चों के साथ ये प्रयोग काफ़ी कारगर साबित हो सकता है। कितना आनंद महसूस होगा शायद एक दूसरे के साथ! न सिर्फ़ एक दूसरे के प्रति आदर बढ़ेगा बल्कि आपसी समझ, पारदर्शिता, एक दूसरे के प्रति सहजता और प्रेम भी प्रगाढ़ होगा, शायद रिश्तों में नयापन महसूस होगा।

ये सत्य है वास्तविक जीवन में परेशानियों पर बात करते वक़्त हमारे शब्द और बातचीत करने का तरीक़ा और हमारा व्यवहार उस विषय को महत्वपूर्ण और गंभीरता से लेने पर विवश कर सकता है। लेकिन व्यवहार में आत्मीयता झलकनी चाहिए और विचारों में चिंतन। शब्दों की अभिव्यक्ति उसके अर्थ में जान डाल देती है अगर शिष्ट शब्दों का प्रयोग हो तो और भी अधिक सम्मानजनक बात है सिर्फ़ बाहर नहीं अपने दैनिक जीवन में परिवार के सदस्यों के बीच भी संवेदनशीलता और तर्क में उस साझेदारी का होना आवश्यक है जिसे हम अक्सर सिर्फ़ सोशल साईट्स पर ही बिखेरते हैं। हमारी प्रतिक्रिया ही हमें इस योग्य बनाती है कि लोग हमसे सलाह लें, अपनी परेशानियाँ हमसे बाँटें। लेकिन सिर्फ़ बाहर के लोग ही नहीं बल्कि अपनों के मन में भी यही सोच विकसित करें। हमारा संतुलित व्यवहार, सहयोगी प्रकृति और गहरी सोच ही हमें किसी परिचर्चा का हिस्सा बना सकती है और कभी-कभी किसी समस्या के समाधान का एक महत्वपूर्ण अंग भी। परन्तु ये प्रतिभा कौशल फ़ेसबुक या अन्य सोशल साईट्स पर लोकव्यवहार करते समय और वास्तविक जीवन में व्यवहार करते समय, दोनों ही पर लागू होना चाहिए। तभी आपकी प्रोफाइल वास्तविक है अन्यथा शब्दों की जादूगरी से लोगों को जोड़ना या उनसे जुड़ना हमारे नेता ओर मंत्रीगण आज उच्च पदों पर आसीन होकर कर ही रहे हैं।

इस बारे विचार करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना किसी को फ्रेंड लिस्ट में एड करना, किसी के स्टेटस को लाइक करना, किसी को unfriend करना या किसी के स्टेटस पर प्रतिक्रिया देना। क्योंकि हम अपने जीवन का अनमोल समय कहाँ और क्यों दे रहे हैं, बहुत महत्व रखता है। समय बेशक़ीमती है सिर्फ़ व्यतीत करने के लिये तो बिलकुल भी नहीं है। फ़ेसबुक एक बहुत ही सशक्त माध्यम है समय के सदुपयोग का, बाहरी दुनियाँ को समझने का, भाँति-भाँति के लोगों के जीवन के विवध पहलुओं का आकलन, विश्लेषण कर अनुभव लेने का और निष्कर्ष तक पहुँचने का। ऐसे लोगों के बीच अपने विचारों का आदान-प्रदान करने का जिनसे हम अक्सर मिल नहीं पाते या अगर मिल भी लेते हैं तो अपने दूसरे महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति के लिए। हालाँकि उनसे सीखने के लिए बहुत कुछ होता है, या जो हमारे पास है उसे बाँटने के साथ- साथ उसमें पॉलिशिंग या सुधार करने को बहुत कुछ होता है। ये लोग कोई भी हो सकते हैं - आपके मित्र, शिक्षक, परिजन या कोई बड़ा अधिकारी वर्ग या कभी-कभी फ्रेंड्स ऑफ़ फ्रेंड भी। सबसे महत्पूर्ण है कि ये हमारे घर के सदस्य भी हो सकते हैं। इसलिए शब्दों का सही चयन सिर्फ़ सोशल साईट्स पर ही नहीं, बल्कि अपने व्यक्तिगत जीवन में अपने या अपनों के बीच प्रत्यक्ष संवाद में भी करें। वास्तविकता से जुड़े शब्दों को अपनायें, जिन्हें हम अपनी नित्य प्रति की जीवन शैली से भी जोड़ सकें। अगर आप श्रेष्ठ हैं तो उसे बाहर यथार्थ के धरातल पर लायें। सिर्फ़ लोगों को प्रभावित करने के लिए आत्मीय, व्यावहारिक होकर विमर्श तो कतई न करें, जब आप अपने वास्तविक जीवन में उन परेशानियों और मुद्दों से स्वयं जूझ रहे हों। सलाह उसी बात की दें जिस पर आप स्वयं अमल कर चल सकें। मेरा ऐसा मानना है कि ज़मीन की लड़ाई लड़ें, सिर्फ़ शब्दों की नहीं। साथ ही शब्दों का चयन बड़ी सतर्कता से करें सोशल साईट्स हो या फिर वास्तविक जीवन।


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