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ISSN 2292-9754

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05.03.2017


जैन साहित्य का हिंदी साहित्य में अवदान

शोध संक्षेप

हिंदी साहित्य की गौरवशाली परंपरा न सिर्फ बेहद प्राचीन है बल्कि प्रेरणास्पद भी। हिंदी साहित्य का सबसे प्राचीन साहित्य प्राकृत तथा अर्धमागधी में रचा गया जिसका जन्मदाता जैन पौराणिक ग्रन्थ अथवा साहित्य को माना जाता है सबसे प्राचीन साहित्य प्राकृत एवं अर्धमागधी में ही रचे गए जो जैन धार्मिक ग्रंथों के रूप में थे। जैनाचार्यों ने अपनी आत्मसाधना से बचे हुए समय में अनेक साहित्यिक कृतियों का सृजन किया तथा अपनी विलक्षण साहित्य प्रतिभा से गौरवशाली हिंदी साहित्य में अपना बहुमूल्य अवदान दिया। प्रस्तुत शोध पत्र में जैन साहित्य का हिंदी साहित्य में योगदान का विवेचन किया गया है।

प्रस्तावना

भारत देश सदा-सदा से साहित्य का प्रमुख समृद्ध केन्द्र रहा है। यहाँ के ऋषि-मुनियों ने प्राणीमात्र के हित को दृष्टि में रखते हुए समय-समय पर सारगर्भित एवं सर्वजन सुलभ साहित्य की रचना की है। हिंदी साहित्य में प्राचीनकाल से ही जैन साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अनेक लोकोपकारी जैनाचार्यों ने अपने जीवन का बहुभाग सर्वजनहितकारक साहित्य की रचना में व्यतीत किया है। हिंदी साहित्य के आदिकाल में अनके रचनाकार और उनकी रचनाएँ मिलती हैं हिंदी साहित्य के कालविभाजन के अंतर्गत नाथों का साहित्य,सिद्धों का साहित्य मिलता है इसी कड़ी में जैन साहित्य जिसका हिंदी साहित्य की आधारपीठिका तैयार में बहुमूल्य योगदान रहा। भारत के पश्चिमीभाग में जैन साधुओं ने अपने मत का प्रचार हिन्दी कविता के माध्यम से किया। इन्होंने "रास" को एक प्रभावशाली रचनाशैली का रूप दिया। जैन तीर्थंकरों के जीवन चरित तथा वैष्णव अवतारों की कथायें जैन-आदर्शो के आवरण में "रास" नाम से पद्यबद्ध की गयी। अतः जैन साहित्य का सबसे प्रभावशाली रूप "रास" ग्रंथ बन गये। हिंदी साहित्य में वीरगाथाओं मे रास को ही रासो कहा गया।

यह हमारा दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है की जैनाचार्य द्वारा प्रणित उत्कृष्ट साहित्य कृतियों को सिर्फ आध्यात्मिक साहित्य मानकर छोड़ दिया गया उनके साहित्यिक सौष्ठव से हिंदी साहित्य कितना लाभान्वित हुआ है इस दृष्टि से उनका मूल्यांकन नहीं किया गया। हिंदी साहित्य में जैन साहित्य के प्रभाव पर भी दो मत हैं प्रथम आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय जैनाचार्यों की कृतियों को उपदेशात्मक साम्प्रदायिक कृतियाँ कहकर ख़ारिज कर देते है वहीं दूसरी ओर डॉ. रामकुमार वर्मा हिंदी साहित्य के विकास में जैनाचार्यों के अवदान को स्वीकारते हुए स्पष्ट करते हैं कि वास्तव में हिंदी साहित्य की उत्पत्ति और विकास में जैनाचार्यो का बहुत बड़ा योगदान रहा विशेषतः अपभ्रंश, जो जैनियों की मूल भाषा शैली थी जिसमें जैन साहित्य के सिद्धांतों की रचना के साथ अपभ्रंश का हिंदी के रूप में विकास भी हुआ। इस प्रकार कहा जा सकता है भाषा विज्ञान की दृष्टि से और हिंदी के प्रारंभिक सूत्रपात में जैन धर्म की भूमिका महत्वपूर्ण रही। किन्तु जैन साहित्य का अध्ययन विशेषतः हिंदी साहित्य में नाना प्रकार के प्रत्यवायों से आक्रांत रहा है इसका कारण एक ओर इसे धार्मिक आग्रह का साहित्य कहकर बहिष्कृत करने का प्रयत्न किए गया है वहीं दूसरी और धार्मिक जोश और रूढ़ि दर्शन के प्रेमियों ने तरह-तरह की सीमाओं में अनुकिलित करने की चेष्टा भी की। जबकि हिंदी साहित्य में जैन साहित्य का एक महत्वपूर्ण विशिष्ट स्थान है।

लोकोपकारी अनेक जैनाचार्यों ने अपने जीवन के अधिकांश समय में जैन साहित्य से सम्बंधित अनेक रचनाएँ कीं। जैन धर्म में बड़े–बड़े जैनाचार्य हुए हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं से न केवल जैन साहित्य प्रदीप्तिमान किया है अपितु हिंदी साहित्य के इतर क्षेत्रों में भी अपनी लेखनी के जोहर दिखाये हैं। जिनसेन का "आदिपुराण" और जिनसेन (द्वि.) का "अरिष्टनेमि" (हरिवंश) पुराण, रविषेण का "पद्मपुराण" और गुणभद्र का "उत्तरपुराण"। प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में भी ये पुराण उपलब्ध हैं। पुराणों का मूल प्रतिपाद्य विषय ६३ शलाका-पुरुषों के चरित्र हैं। इनमें २४ तीर्थंकर, १२ चक्रवर्ती, ९ बलदेव, ९ वासुदेव (नारायण) और ९ प्रतिवासुदेव (प्रतिनारायण) हैं। जिनमें पुराण पुरुषों का पुण्यचरित्र वर्णन किया गया हो उसे पुराण कहते हैं। हरिवंशपुराण में बाइसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ और नव में नारायण श्री कृष्ण का वर्णन करते हुए कौरव और पाण्डवों का वर्णन है और पद्मपुराण में आठवें बलभद्र श्रीरामचन्द्र एवं नारायण लक्ष्मण का वर्णन है। इस तरह से ये दोनों ग्रन्थ क्रमशः जैन महाभारत और जैन रामायण कहे जाते हैं। ये भारत की संस्कृति, परम्परा, दार्शनिक विचार, भाषा, शैली आदि की दृष्टि से भी ये पुराण बहुत महत्वपूर्ण हैं।

इसके अतिरिक्त जीवन दर्शन, न्याय, व्याकरण, काव्य, नाटक, कथा शिल्प, मन्त्र, तंत्र, वास्तु, वैधक आदि अनेक विषयों पर अनेक भारतीय भाषाओं में जैन साहित्य उपलब्ध है। आगमिक साहित्य तथा प्राचीन टीकाएँ प्राकृत भाषा में लिखी श्वेताम्बर ने आठवीं शती से और दिगम्बरों ने उससे कुछ पहले संस्कृत में रचनाएँ करना प्रारंभ किया। बाद में १०वीं,से १२वीं, शती अपभ्रंश भाषा में जो उस समय की जनभाषा में की गई उन्होंने हिंदी और गुजराती साहित्य को तथा दक्षिण में तमिल और कन्नड़ साहित्य को विशेष रूप से समृद्ध किया। जैन साहित्य की हिंदी साहित्यिक विधाओं के अवदान स्वरूप अगर देखा जाय तो भारत में कथाएँ केवल कौतुकमयी प्रवृत्ति को चरितार्थ करने के लिए नहीं अपितु शिक्षण के लिए भी प्रयुक्त की जाती थीं यही कारण है की ब्राह्मणों ने, जैनियों ने, बौद्धों ने समान भाव से इस अंग को परिवर्धित किया। बौद्धों का जातक साहित्य और जैनियों की कहानी लेखन शैली को शायद ही कोई पराजित कर सके। कहानी उपन्यास सभी में जैनाचार्यों को अग्रणी कहा जायेगा। हिंदी कथा साहित्य में राम कथा का अस्तित्व सबसे पुराना है। रामकथा से सम्बंधित रचनाएँ जैन साहित्य की १- सीता चरित,२- राम पुराण-सोमसेन द्वारा रचित, ३- राम चरित-पद्मनाभ द्वारा रचित, ४- महाभारत विषयक पुराण, ५– पाण्डव पुराण और भी अन्य चरितात्मक साहित्य लिखे गए हैं। वेद, पुराण, आरण्यक और उपनिषद जितने भी हैं भारतीय साहित्य में ये सभी सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ हैं। बौद्ध और जैन साहित्य में रामकथा को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। जैन कवि विमलस्रूरी रचित "पउमचरिय" प्राकृत भाषा का आद्य ग्रन्थ है। इसके बाद संस्कृत में रविवेण की पद्म पुराण की रचना हुई फिर स्वयं भू की अपभ्रंश पुस्तक "पउमचरिय" और फिर अनेक जैन रामायणों की रचना हुई। इसमें कोई संदेह नहीं कि जैनाचार्यों ने केवल रामकथा पर ही हिंदी साहित्य को इतनी कृतियों से परिचित करा दिया। अतः कहा जा सकता है कि हिंदी साहित्य में जैनाचार्यों ने अनेक अमूल्य धरोहर रामायण के रूप में दी है।

हिंदी के प्रथम कवि माने जाने वाले स्वयं भू जिनका समय ७३४ से १०१६ के मध्य माना जाता है "पउम चरिउ"[पद्मचरित] नामक ग्रन्थ में हिंदी के प्राचीन रूप को देखा जा सकता है जिसे जैन रामायण के नाम से जाना जाता है। इसी आधार पर स्वयं भू अपभ्रंश के वाल्मीकि कहे जाते हैं। इसी श्रंखला में आचार्य देवसेन जैन धर्म के दूसरे महत्वपूर्ण कवि हैं। इनका मुख्य ग्रन्थ "लघु नयचक्र" है इसकी प्रारंभिक अवस्था दोहे के रूप में थी किन्तु बाद में यह गाथा के रूप में परिवर्धित हुआ। इसके अतिरिक्त जन मानस को जीवन के प्रति गहरा एवं दूरदर्शी होने के लिए अनेक शिक्षाप्रद काव्य लिखे गए जिनमें कवि रामसिंह कृत पहुड़ दोहा उल्लेखनीय है। "प्राकृत व्याकरण एवं भाषा की दृष्टि से जैन साधकों में सबसे विख्यात साहित्यकार "आचार्य हेमचन्द्र" माने गए इनकी कविता में शताब्दियों की भाषा शैली का दर्पण दिखाई देता है साथ ही इनकी रचना में संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का समावेश किया है।" अपभ्रंश के उदाहरण में इन्होंने पूरे दोहे या पद्य उद्धृत किये हैं ,जैसे -

भल्ला हुआ जु मारिया बहिणी महारा कंतु।
लज्जेजं तु वयंसिअहु जई भग्गा घरु एन्तु।

अर्थात्- भला हुआ जो मारा गया, हे बहिन; हमारा कांत। यदि भाग हुआ घर आता तो मैं समवयस्काओं से लज्जित होती।

इनका "सिद्धहेम" या हेमचन्द्र "शब्दानुशासन" और "कुमारपाल चरित्र" का साहित्यिक दृष्टि से विशद् विवेचन हुआ है इसमें भी अपभ्रंश के पद्य रखे गए हैं। सोमप्रभ सुरी - ये भी एक जैन पंडित थे इन्होंने संवत १२४१ में "कुमारपालप्रतिबोध" नामक एक गद्य पद्यमय संस्कृत–प्राकृत काव्य लिखा यह ग्रन्थ अधिकांश प्राकृत में ही है बीच-बीच में संस्कृत श्लोक और अपभ्रंश के दोहे आये हैं। "पुष्प दन्त" रामकथा परंपरा के दूसरे सबसे बड़े महाकवि हैं। जैन साहित्य में राम कथा के आधार पर या उसके माध्यम से केवल राम लक्ष्मण भरत आदि का ही वर्णन नहीं मिलता अपितु अन्य कथाएँ भी उनमें निहित होती हैं जैसे भगवान महावीर,भगवान अजीतनाथ,भावन वणिक, कपिल ब्राह्मण, वनमाला, राजा श्रेणिक विद्याधर, महारक्ष, राजा श्री कंठ, चौबीस तीर्थकर, भगवान वरुण, हनुमान, सीताजी की अग्नि परीक्षा, कनक माला के विवाह, लक्ष्मण के पुत्र, चक्रवती बाहुबली, इंद्र विद्याधर, दशानन मंदोदरी। ये सभी कथाएँ जैन साहित्य के अमूल्य धरोहर हैं इनसे प्रेरित होकर परलौकिक अभ्युदयों की सिद्धि कर सकता है इनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं बल्कि सामाजिक धार्मिक उपदेश है। इनका झुकाव पूर्ण नैतिकता एवं स्वार्थपरक इच्छाओं का त्याग सार्वभौम क्रियाशील,परोपकार की भावना कल्याण से युक्त आकर्षण का वर्णन व्याख्यान और उपदेश इसका प्रधान ध्येय है।

निष्कर्ष

अपने काल एवं समय के सापेक्ष अनेक लोकोपकारी जैनाचार्यों ने अपने जीवन का बहुभाग सर्वजनहितकारक साहित्य की रचना में व्यतीत किया है। आचार्य स्वयं भू , आचार्य विमल सूरि, आचार्य पुष्पदंत, जैसे जैनाचार्यों ने अपनी रचनाओं में साहित्य के नवों रसों के सुंदर प्रयोग से स्त्री का शृंगारिक वर्णन, प्रकृति का मानवीकरण पर्वत, ऋतुओं नदियों, प्राकृतिक दृश्यों, जन्म विवाह, उत्सवों एवं जीवन चरित के माध्यम से अपनी सृजन दृष्टि में शृंगारिक हाव भाव विलासों संपत्ति तथा विपत्ति में सुख दुःख के उतार चढ़ाव के कलात्मक हृदयग्राही चित्र उपस्थित किये हैं जिनसे हिंदी साहित्य प्रभावित एवं लाभान्वित हुआ है। इनके लिखे चरित काव्यों के अध्ययन से परवर्ती काल के हिंदी साहित्य कथानकों, कथानक रुढ़ियों, काव्य रूपों, वर्णन शैलियों छंद योजना और वस्तु विन्यास की स्थिति को स्पष्ट किया है। कवि के सुंदर पद विन्यास ने पाठक का मन आकर्षित किया है। भारत की अनेक भाषाओं में लिखा जैन साहित्य , जिनमें प्राकृत और संस्कृत भाषा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। अपभ्रंश भाषा में लिखे इस साहित्य का हिंदी साहित्य पर बहुत प्रभाव पड़ा जो केवल वैज्ञानिक दृष्टि से नहीं अपितु यह अन्य रूपों में भी दिखाई दिया। हिंदी साहित्य की काव्य, नाटक, गद्य आदि विधाओं में जैन साहित्य वृहद रूप में लिखा गया है। चम्पू काव्य भी जैन-साहित्य में बहुत हैं। सोमदेव का यशस्तिलक चम्पू, हरिचन्द्र का जीवन्धर चम्पू और अर्हद्दास का पुरुदेवचम्पू उत्कृष्ट चम्पू काव्य हैं। गद्य ग्रन्थों में वादीभिंसह की गद्यचिन्तामणि उल्लेखनीय है। नाटकों में हस्तिमल्ल के विक्रान्त कौरव, मैथिलीकल्याण, अंजनापवनंजय आदि दर्शनीय हैं। स्तोत्र साहित्य भी कम नहीं है। आचार्य श्रीमानतुंग का भक्तामर स्तोत्र, महाकवि धनंजय का विषापहार, कुमुदचन्द्र का कल्याण मन्दिर आदि स्तोत्र साहित्य की दृष्टि से भी उत्कृष्ट है।

हिंदी के आदिकालीन साहित्य में जैन साहित्य के ग्रन्थ सर्वाधिक संख्या में और सबसे प्रमाणिक रूप में मिलते हैं। इन्होंने हिंदुओं में प्रचलित लोक कथाओं को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाया और परंपरा से अलग उसकी परिणति अपने मतानुकूल दिखाई। इसके अतिरिक्त जैनाचार्यों के लेखन में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से तत्कालीन परिस्थितियों का समावेश भी रहा इस प्रकार कहा जा सकता है की हिंदी साहित्य की आधार पीठिका में जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है।

सन्दर्भ ग्रन्थ

१. हिंदी साहित्य का इतिहास –आचार्य रामचन्द्र शुक्ल प्रकाशक –मालिक एंड कम्पनी –जयपुर पृ.३४
२. हिंदी साहित्य का इतिहास –आचार्य रामचंद्र शुक्ल –ए टू जेड पब्लिकेशन इलाहाबाद पृ.१६
३. हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास डॉ.रामकुमार वर्मा –लोकभारती प्रकाशन इलाहबाद पृ.६९
४. जैन रामायणों का साहित्य में योगदान –"शब्द ब्रह्म" अन्तराष्ट्रीय मासिक शोध पत्रिका अंक नवम्बर २०१६
५. जैन साहित्य का संक्षिप्त इतिहास -- http://hi.encyclopediaofjainism.com
६. हिंदी साहित्य उद्भव और विकास,डॉ.हजारी प्रसाद दिवेदी राजकमल प्रकाशन दिल्ली पृ.२६
७. हिंदी साहित्य का इतिहास –आचार्य रामचंद्र शुक्ल पृ.३३
८. जैन साहित्य की रासपरक रचनाएँ - vimisahitya.wordpress.com
९. राम कथा- स्वयं भू और तुलसी एक अवलोकन पृ.५७
१०. हिंदी साहित्य के विकास में जैन धर्म की भूमिका –"शब्द ब्रह्म" अन्तरराष्ट्रीय मासिक शोध पत्रिका अंक मई २०१४


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