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ISSN 2292-9754

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03.22.2016


पतझड़ में सावन देखा है

पतझड़ में सावन देखा है।
गोरी का यौवन देखा है।

जब भी हमने देखा उसके।
चेहरे का दर्पन देखा है।

कलयुग की सहमी सीता ने।
रावन ही रावन देखा है।

मैंने इन आँखों से लुटते।
इक अबला का तन देखा है।

कहता है वो मुझको हीरा।
जिसने मेरा मन देखा है।

काँटे हैं आँखों में फिर भी।
सपने में उपवन देखा है।

मेरी हर साँसों ने उसकी।
साँसों में चंदन देखा है।

बाबा की बूढ़ी आँखों में।
मैंने भी बचपन देखा है।


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