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ISSN 2292-9754

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03.05.2016


मेरे हाथोँ मे इक गुलाब देकर

मेरे हाथोँ मे इक गुलाब देकर।
चल पड़ा वो मुझे जवाब देकर।

चाहता है वो क्या करना साबित।
प्यार मुझको यूँ बेहिसाब देकर।

ज़ख़्म सीने का फिर खुरच डाला।
शायरी की वही किताब देकर।

कर दिया रात से मेरा सौदा।
मेरी क़िस्मत में आफ़ताब देकर।

सुर्ख़ आँखों मे अश्क के मोती।
क्या मिला ग़म मुझे जनाब देकर।

भूल जाते हैं मुझे दोस्त सभी।
एक आदत कोई ख़राब देकर।

सेठ जी के महल से इक अबला।
लौट पाई नहीं हिसाब देकर।


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