शिवशंकर यादव

दीवान
अपने आँचल में ही छुपा ले माँ
आपके दर पर दिवाना आ गया
इंसानियत की मेरी बीमारी नहीं जाती
एक पल को भी नहीं आराम है
जान से ज़्यादा प्यारी यादें
झूठे अभिनय में बेहुनर हूँ मैं
देखो मेरा वक़्त ये
नाम अपना किसान है साहब
पतझड़ में सावन देखा है
बुरा है क्या और क्या अच्छा
मेरे हाथोँ मे इक गुलाब देकर