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ISSN 2292-9754

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06.15.2016


“संस्वीकृति” (Confession)

“इंसान ग़लतियों का पुतला है." और, जो जानते बूझते दौहराई जाएँ? उन्हें क्या कहा जाएगा? व्यक्ति की मानसिकता पर कुछ बातों का गहरा प्रभाव पड़ता है. खास कर बचपन में. एक कच्ची शाख की भाँति होता है बचपन. सही खुराक मिले तो शाख तन्दरुस्त और पक्की हो जाती है और ग़लत खुराक मिलने पर वो शाख ऊपर से तो पकी हुई परंतु भीतर से कमज़ोर, असहाय, लाचार होती है।

"माँ….." अचानक से तारा, विनीता को पुकरती हुई।

"क्या हुआ बेटा? तुम इतनी घबराई हुई क्यूँ हो? कोई बुरा स्वप्न देख लिया क्या?" विनीता और शैलेश दोनों अपने कमरे से भागते हुए आए।

"ऐसा लगा कि मेरे आस पास कोई था," तारा घबराती हुई बोली।

“भयंकर दृश्य, देखने के पश्चात एक अजीब सी कंपन शरीर को जकड़ लेती है, किसी विकराल छाया के दिख जाने से जिस भय से साक्षात्कार होता है, सुनसान रास्ते पर हल्की सी ध्वनि मृत्यु को दिखाती है, तारा ठीक उन्हीं परिस्थितियों से गुज़र रही थी।”

"पता नहीं क्या हुआ है मेरी बेटी को. कुछ समझ नहीं आ रहा।"

"चिंता मत करो, कुछ नहीं होगा तारा को। कोई भयानक स्वप्न में थी शायद। थोड़ी देर में ठीक हो जाएगी। ऐसा करो, तुम आज इसके पास ही सो जाओ।"

बेटी की चिंता में विनीता को रात भर नींद नहीं आई। तारा सारी रात विनीता के गले लग, उसे कस के पकड़ कर सोने के प्रयास में जुटी रही। बच्चों के मानस पटल पर एक बार जो अंकित हो जाए वो उम्र भर के लिए अपना अस्तित्व छोड़ जाता है। समय के साथ ज़ख़्म भर जाते हैं, परंतु कुछ ऐसे ज़ख़्म भी होते हैं जो समय के साथ और गहरे हो जाते हैं। उस छवि ने भी तारा के मन को प्रभावित किया। दिन रात वो उसी डर में जी रही थी, मर भी रही थी। कभी अपने ही शरीर पर से हाथ मार-मार कर कुछ झाड़ने का प्रयास करती, कभी अपने चेहरे को बार-बार धोती, विनीता कुछ भी समझ नहीं पा रही थी। फिर समय के साथ-साथ सब ठीक होता दिखाई दिया। …केवल दिखाई दिया!

"माँ, मैं खेलने के लिए जाऊँ।"

विनीता की ख़ुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा, उसने शैलेश को फोन कर सब बताया।

"चलो, अब तो तुम्हारी चिंता दूर हो गयी।"

"हाँ शैलेश, मैं अब निश्चिंत हूँ।"

कुछ दिन बीतने पर विनीता ने शैलेश से बाहर घूम आने की फ़रमाइश की। तारा को घूमना बहुत पसंद है। विनीता ने पूरी कोशिश की कि तारा उस सदमें से उभर आए। और एक माँ इसमें कामयाब भी हुई। तारा के स्कूल से नतीजा आया। तारा ने अपनी कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। इस ख़ुशी ने भी उस चोट पर मरहम लगाने का सफल कार्य किया। सारा परिवार जब घर लौटा तो थक कर चूर हो चुका था।

"मैं तारा को सुला आती हूँ।"

"आज तो तारा ख़ुद ही सो जाएगी। वो निश्चिंत है आज और ख़ुश भी।"

"हाँ, आज तो मैं भी निश्चिंत हूँ. मेरी बेटी लौट आई है।"

तारा अपने कमरे में सोने के लिए चली गयी। विनीता और शैलेश भी निश्चिंत हो कर चले गये। कोई भय नहीं, कोई चिंता नहीं।

रात के तक़रीबन 2 बजे एक भयावह आवाज़ में तारा के डर ने शोर किया और वो छटपटाती हुई बरामदे में आ पहुँची।

"माँ, वो…. उसने मुझे…. मैंने उसे वहाँ… तुम्हारे कमरे की तरफ़ आते हुए देखा।" फिर से तारा पहले जैसे ही अपने शरीर को झाड़ने लगी। अपने चेहरे पर हाथ फेरने लगी। ख़ुद को छूने के एहसास से उसे घिन होने लगी। किसी ने उसके शरीर पर अमानवीयता की परत चढ़ा दी हो जैसे….।

"कौन? कोई नहीं है यहाँ पर। क्या बात क्या है तारा, बेटा पूरी बात बताओ माँ को।" तारा की नाज़ुक हालत को देखते हुए विनीता ने अपनी ममता की छत उसके सर पर कर दी, ताकि वो अपना हर ग़म, हर परेशानी भूल जाए। तारा ने माँ के आँचल में दुनिया की सबसे गहरी और सुकून की नींद ली। अगले ही दिन विनीता ने अपनी माँ से बात की। माँ के कहने पर विनीता ने तारा को काली मंदिर वाले पंडित जी से भभूत दिलवाई और काली माँ को एक माँ होने की दुहाई देने लगी।

"तू भी तो एक माँ है, तो फिर कैसे अपनी ही बेटी को तकलीफ़ में देख सकती है. तेरी हर रज़ा को आज तक मानती आई हूँ। आँखें बंद करके हर फ़ैसले के समक्ष माथा टेका है। तेरी चौखट के सिवा कोई नहीं है मेरा माँ! संभाल दे सब कुछ. संभाल दे!"

घर आते ही विनीता ने तारा को मंदिर की भभूत खिलाई। आज तारा अपने कमरे में जाने के ख़याल मात्र से भी डरने लगी। विनीता की चिंता ने एक भयनक महल का रूप ले लिया। शैलेश के घर लौटने पर विनीता ने मंदिर की सारी बात बता दी।

"पंडित जी ने कहा है, तारा को काली मंदिर में ग्यारह दिनों तक माथा टेकना होगा और भभूत भी दी है।"

"अभी कहाँ है तारा?"

"सो रही है। बड़ी मुश्किल से सुलाया है। ना जाने क्या हो गया है मेरी बच्ची को?" उसका बेजान पड़ा शरीर गिरने लगा। अगली सुबह तारा ने थोड़ा सा नाश्ता किया और बरामदे में बैठ गई। इतवार का दिन था. गली के सभी बच्चे चौंक में खेल रहे थे। तारा की सहेली राशि ने उसे आवाज़ लगाई, "चल तारा खेलने चलते हैं। बहुत दिन हो गयी तू खेलने नहीं आई। चाची, तारा की तबीयत ख़राब थी क्या?"

"नहीं बेटा, बस ऐसे ही. तारा, बेटा खेलने जाओ तुम। खेलोगी तो मन हल्का हो जाएगा तारा।" माँ ने व्यथित मन से समझाते हुए कहा.

तारा अपनी दोस्त के साथ चली तो गयी, परंतु वो परछाई उसके ज़हन में कुछ ऐसे स्थापित हो गयी कि हर तरफ़ उसे वही नज़र आ रही थी।

"मैं बाकियों जैसी क्यूँ नहीं हूँ? क्या हो रहा है मेरे साथ? क्यूँ हो रहा है?

सब बच्चे खेलते रहे और तारा अपने सवालों में उलझती चली गयी। एक 9 साल की बच्ची और जीवन के बड़े-बड़े सवालों के जवाब ढूँढ रही है।

मुझे माँ को सारी बात बतानी होगी।

जाने ऐसी क्या बात थी जो तारा को विचारों की खाई में जाना पड़ा। माँ बेटी के रिश्ते में कभी कोई बंदिश नहीं होती, कोई दीवार नहीं होती, कोई फ़ासला नहीं होता। होता है तो बस प्यार और विश्वास। इसी प्यार और विश्वास की नींव को रखते हुए बड़ी हिम्मत कर वो विनीता के पास गयी। तभी शैलेश भी वहीं था। ऐसी परिस्थिति में बच्चा केवल माँ को अपना मानता है। तारा वहाँ कुछ भी ना कह सकी। सहमी वो लौट गयी। जब-जब ख़ुद को देखती उसी भय से काँपने लगती। काली मंदिर वाले पंडित जी ने जो जैसा कहा था विनीता ने ठीक वैसा ही किया। परंतु कोई लाभ ना हुआ। जिसने जो-जो कहा उसने सब किया। ठीक एक सप्ताह पश्चात फिर वैसा ही दोहराया गया। तारा चिल्लाई, घबराई और अपने शरीर को फिर से झाड़ने लग गयी, अपने चेहरे को पानी से साफ़ करती, हाथ पैरों से कुछ यूँ झाड़ती कि किसी परत को उतारना हो जैसे। विनीता एक लाचार माँ की भाँति सब देखती रहती पर कुछ कर नहीं पाती।

"देखो विनीता मेरी बात का बुरा मत मानना। मैं ये नहीं कहती कि तारा बीमार है। लेकिन मन की तस्सली के लिए तुम तारा को किसी मनोचिकित्सक के पास क्यूँ नहीं ले जाती?" विनीता की मित्र ने उसे सुझाव दिया।

अब विनीता के पास और कोई विकल्प नहीं रह गया था। वो तारा को मनोचिकित्सक के पास ले गई। मनोचिकित्सक ने अपना काम शुरू किया। तारा के भीतर का सारा भय उसने विनीता के समक्ष रख दिया।

"मेरी बेटी इतनी तकलीफ़ में है और मैं माँ होने के बावज़ूद उसके दर्द को महसूस नहीं कर पाई. कैसी माँ हूँ मैं? धिक्कार है ऐसी माँ होने पर. धिक्कार है।"

"देखो विनीता, सम्भालो ख़ुद को। तारा के साथ जो कुछ भी हुआ, उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अब भी सब ठीक कर सकती हो तुम," मनोचिकित्सक धैर्य का ढाँढस बँधाते हुए बोली।

"हाँ, मैं अपनी बेटी को मुक्त करवाऊँगी इस दर्द से। मैं, उसकी माँ!"

सच के लिए होसला कभी ख़त्म नहीं होना चाहिए, भले परिस्थिति जैसी भी हो। परिस्थितियों के विपरीत चलते इंसान अपनी मंज़िल तक पहुँचे, यही उसकी जीत है। विनीता ने भी कुछ ऐसा ही सोचा….

"ढूँढोगे अगर तभी मिलेंगे रास्ते

मंज़िल की फ़ितरत है कभी चल कर नहीं आती.."

"देखो बेटा, तुम अब बड़ी हो गयी हो। कुछ बातें मेरे और तुम्हारे बीच रहनी चाहिएँ। और यदि तुमने किसी को भी बताने का प्रयास किया तो मुझे तो तुम अच्छे से जानती ही हो.. है ना? ठीक है मेरी प्यारी बच्ची," ये आवाज़ तारा के भीतर, और भीतर गहराई में समाने लगी।

तारा फिर चिल्लाई और विनीता से आ कर लिपट गयी। मैं अपनी बेटी के साथ हूँ।

घर पहुँचते ही विनीता ने शैलेश को पुकारा।

"क्या हुआ? फिर से कोई बात हो गयी क्या? मुझे लगता है हमें तारा को पागल खाने भिजवा देना चाहिए।"

थड़ाप….. एक ज़ोर के तमाचे की आवाज़…!

"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी। तुम इस हद तक गिर सकते हो? तारा, बेटी है तुम्हारी!"

"हाँ, किया मैने ये सब.. नहीं है ये मेरी बेटी और ना ही मैं इसका बाप हूँ। सौतेले कभी सगे नहीं हो सकते।"

तारा इस बात से बेख़बर थी कि शैलेश उसके सगे पिता नहीं है। शैलेश ने अपनी इस संस्वीकृति में अपने दोनों गुनाह क़ुबूल किए!


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