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ISSN 2292-9754

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02.11.2016


नींव विश्वास की!

यादवी, पाँच साल की छोटी सी बच्ची। मासूम चेहरा, सारा दिन घर में चहलक़दमी मचाए रखती है, एक कमरे से दूसरे कमरे तक, दूसरे से तीसरे तक दौड़ लगाती रहती है। कभी ऊपर तो कभी नीचे, उनके घर आने वाला हर शख़्स उसे बहुत प्यार करता है। वो है ही ऐसी। यादवी के पिता ने अभी तक उसे देखा नहीं था; वो विदेश में रहते हैं। यादवी के जन्म से कुछ समय पहले ही उसके पिता का वीज़ा लग गया था। आज यादवी बहुत ख़ुश है। उसके पिता विदेश से वापिस आ रहे हैं और उसके लिए ढेर सारे खिलौने लाने वाले हैं।

"सात समुंदर पार से, गुड़ियों के बाज़ार से
अच्छी सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना
पापा जल्दी आ जाना..
पापा जल्दी आ जाना…"

ये गीत यादवी को उसकी माँ ने बचपन से सिखाया था। यादवी आज सबसे कहती फिर रही है। "मेरे पापा आएँगे। ढेर खिलौने लाएँगे। गुड़िया, हवाई जहाज़, और मेरी गुड़िया का घर भी।" नाचते उसके क़दम पूरे घर में हो-हल्ला मचा रहे हैं।

दरवाज़े की घंटी बजी।

"पापा आ गये… पापा आ गये…," यादवी का गीत फिर से शुरू हो गया।

यादवी की माँ ने दरवाज़ा खोला।

"आप आ गये। यादवी देख तेरे पापा आ गये।"

यादवी भागते हुए आई और अपने पापा के गले लग गयी। उसे ढेर सारे खिलौने मिले। सारा दिन यादवी उनके साथ खेलती रही और अपने दोस्तों को गुड़िया के क़िस्से सुनाती रही।

"सुनंदा, क्या बात है। तुम कोई बात क्यूँ नहीं कर रही। नाराज़ हो क्या मुझसे..?"

"आप इतने समय के बाद आए हो। क्या आपको हमारी याद नहीं आती थी?"

"अरे पगली, ऐसी कोई बात नहीं थी। हाँ तुम्हें ख़त बहुत समय के बाद लिख पाता था। मैं भी क्या करता, काम का बोझ ही बहुत था। पर अब तो तुम्हारे पास आ गया हूँ ना। अब सारा ग़ुस्सा निकाल लो," बाँहों को फैलाते हुए विक्रम ने सुनंदा की ओर प्यार भरी नज़रों से देखा। उस समय सुनंदा के मन में कोई गिला-शिकवा नहीं रह गया था।

जीवनसाथी के केवल स्पर्श मात्र से ही एक ऐसा सूकून मिलता है कि फिर और किसी वस्तु की अभिलाषा रहती ही नहीं। संसार के सारे सुख एक तरफ़ और उसके पति का प्यार एक तरफ़। संसार की हर स्त्री अपने पति का केवल प्रेम चाहती है, केवल प्रेम। वो हर प्रकार की उलझन को सुलझाने में सक्षम होती है। वो टूटती तब है जब उसका भरोसा टूटता है। उसके विश्वास को खदेड़ दिया जाता है। वो विश्वास जो उसे अपने जीवनसाथी पर होता है। ज़िंदगी की हर मार को बिना किसी शिकायत झेल लेती है। बशर्ते उसका जीवनसाथी उसके साथ हो, उसका भरोसा उसके साथ हो। और जब वो उसे छोड़ जाता है तो उसकी दुनिया ही समाप्त हो जाती है। वो उसके बग़ैर अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर पाती। परंतु धोखा किस रूप में, किस चेहरे में नक़ाब की भाँति छिपा रहता है ये कोई नहीं बता सकता।

ठीक वैसा ही कुछ सुनंदा के साथ भी हुआ..

कुछ महीने यूँ ही बीत गये। विक्रम ने अपना कारोबार यहीं शहर में जमा लिया था। कारोबार अच्छा चल रहा था। घर पर भी सब ठीक था। फिर एक दिन अचानक विक्रम अंधाधुंध शराब पी कर आया। सुनंदा को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि बुरी चीज़ों को देखने से जिस इंसान को घिन आती हो वो उन्हें अपने जीवन में कैसे शामिल कर सकता है। सुनंदा को ये बात कुछ हज़म नहीं हो रही थी। वो अभी कुछ सोचती कि विक्रम ने घर में काफ़ी हल्ला मचाना शुरू कर दिया। यादवी अपने पापा का ऐसा बर्ताव देख कर सहम गयी। सुनंदा ने यादवी को दूसरे कमरे में जाने के लिए कहा और विक्रम को शांत करने लग गयी।

"क्या बात हो गयी कि आपको शराब का सहारा लेना पड़ा। किसी ने ज़बरदस्ती की क्या आपके साथ? बताइए मुझे।"

विक्रम तैश में था। वो कुछ भी सुनने की हालत में नहीं था। सुनंदा का उसे कुछ भी पूछना उसके लिए व्यर्थ साबित हो रहा था और उस रात जो विक्रम कहता गया सुनंदा को मानना पड़ा। और अब ये रोज़ का सिलसिला हो गया। रोज़ विक्रम पी कर आता और सुनंदा उसके अहम को शांत करने के लिए उसकी हर बात को सिर झुका कर मानने लगी। विक्रम के मन में अब सुनंदा के लिए ज़रा सा भी प्यार हो, ये बहुत दूर की बात हो गयी थी। सुनंदा को रोज़-रोज़ तकलीफ़ देने से उसका अहम शांत होता। इन सबके रहते यादवी गुमसुम और उदास रहने लगी। अब ना तो वो अपनी गुड़िया के साथ खेलती, ना पापा के लिए गाना गाती, और ना ही उनके पास जाती। एक नन्ही सी बच्ची जो अपने पापा को अपनी ख़ुशियों का मसीहा मानती थी। आज वही मसीहा उस बच्ची की आँखों की नमी का कारण बन गया।

"मम्मी, पापा को क्या हो गया है। वो अब मेरे साथ बात भी नहीं करते और खेलते भी नहीं।"

"कुछ नहीं बेटा। पापा थोड़ा परेशान रहते हैं आजकल। जल्दी ही सब ठीक हो जाएगा," सुनंदा ने यादवी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा।

"आज मुझे जल्दी सोना है। सारा काम ख़तम करके आ जाओ।"

"सुनिए, आज यादवी को बहुत तेज़ बुखार है। वो शायद आपको ऐसे देखकर सहम गयी है। आप उससे अच्छे से बात नहीं करते आजकल। शिकायत कर रही थी वो आपकी," सुनंदा ने माहौल का रुख़ मोड़ने का प्रयास किया परंतु असफल रही।

"सुना नहीं तुमने मैंने क्या कहा," पुरुष सत्ता का पूरा-पूरा रौब दिखाते हुए, दीवार पर ज़ोर से अपना हाथ मारते हुए विक्रम चिल्लाया।

डर और ख़ौफ़ से भरी सुनंदा की आवाज़ जैसे ख़ुद ही चली गयी हो। फिर भी हिम्मत करके उसने कुछ शब्द जोड़े।

"यादवी… बीमार… उसकी देखभाल करनी है.. तो.."

विक्रम को ना सुनने की आदत नहीं थी। और सुनंदा ने तो उसे साफ़-साफ़ इन्कार ही कर दिया था। सुनंदा ने यादवी के कमरे में जाने के लिए अभी क़दम बढ़ाया ही था कि विक्रम ने उसके बालों को पीछे से कुछ यूँ पकड़ कर खींचा कि वो ज़ोर से चिल्ला उठी। अपनी माँ की दर्द भरी आवाज़ को सुनकर यादवी भाग कर बाहर आई। अपने पिता को माँ पर हाथ उठाते उसने पहली बार देखा था। ये सिलसिला तो काफ़ी समय से चल रहा था पर सुनंदा ने यादवी के सामने कभी नहीं आने दिया था। डरी, सहमी सी वो पाँच साल की बच्ची अपनी माँ का पल्लू थामे खड़ी रही और रोने लगी। विक्रम ने यादवी का हाथ झटकते हुए सुनंदा को अपने तरफ़ खींचा और उसे अंदर कमरे में ले गया। एक बीमार बच्ची अपनी माँ के आँचल के लिए तड़पती रही। पर विक्रम को ज़रा भी दया नहीं आई। अगली सुबह सुनंदा जगी तो उसने यादवी को आँगन में ही सोते हुए पाया। यादवी को इस हालत में देखकर उसके दिल पर जैसे कोई पर्वत आ गिरा हो। उसने यादवी को उठाया और भीतर कमरे में ले गयी। उसे मोटी चादर में लिटाया और उसके सर पर गीली पट्टियाँ करने लगी। इस बात से विक्रम को अब कोई फ़र्क़ ना ही पड़ता था कि यादवी कैसी है, वो तो अब उसका चेहरा देखना भी गवारा नहीं करता था। "आख़िर ऐसा क्या हुआ था?" ये बात सुनंदा को अंदर ही अंदर खाए जा रही थी। कुछ भी करके उसे इस बात का पता तो लगाना ही था। उसने उस दिन के बारे में सोचा जब पहली बार विक्रम ने शराब पी थी और समय की कैसेट की रील को पीछे घुमाया।

"हाँ! शांति.. शांति से मिलने गया था विक्रम। ज़रूर उसी ने ही कोई ना कोई बात कही होगी, पर विक्रम को मुझे आ कर बतानी तो चाहिए। यूँ रोज़-रोज़ घर में तमाशा करना क्या अच्छी बात है? छोटी बच्ची है घर में। उसकी मानसिकता पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मुझे कुछ भी करके विक्रम से बात करनी होगी।"

सुनंदा ने विक्रम से पूछने की भरसक कोशिश की। परंतु कोई सफलता नहीं मिली। आख़िर में वो शांति के घर पहुँच गयी।

"क्यूँ शांति, क्यूँ किया तूने ऐसा, क्या मिला तुझे अपने ही भाई का घर उजाड़ कर? मैं अच्छी तरह से जानती हूँ ये सब तेरा ही किया धरा है।"

"जब पता है तो फिर यहाँ क्या करने आई है। सँभाल ले अपनी गृहस्थी। यहाँ आकर अपना और मेरा क़ीमती समय क्यूँ बर्बाद कर रही हो।"
"तुमने ये ठीक नहीं किया। अपने ही भाई का घर बर्बाद कर देना चाहती हो। मैं विक्रम को तुम्हारा असली चेहरा दिखाऊँगी। उसे बताऊँगी कि तुम क्या हो और क्या बनती हो।"

शांति, विक्रम की सगी बहन जो उसे बेहद प्यार करती थी। विक्रम और सुनंदा ने उसकी शादी करवायी थी परंतु समय को कुछ और ही मंज़ूर था। शांति के पति ने उससे अपना नाता तोड़ लिया। शांति का पति आख़िरी बार सुनंदा से मिला था और यह शांति ने देख लिया था। हालाँकि, सुनंदा उसे समझाने के लिए ही गयी थी। परंतु उस दृश्य ने कुछ और ही मोड़ ले लिए। और आज शांति उसी बेबुनियाद बात की इमारत खड़ी कर के बैठी हुई है। उसने विक्रम से ये कह दिया है कि यादवी उसकी अपनी औलाद नहीं है।

फिर क्या था! अटूट विश्वास को तितर-बितर होते कुछ ज़्यादा समय नहीं लगा। विश्वास के घर की नींव कुछ यूँ फिसल गयी जैसे मुट्ठी से रेत। जिस प्रकार घर को खड़ा रखने के लिए एक मज़बूत नीव की आवश्यकता होती है ठीक वैसे ही रिश्तों की इमारत को भी खड़ा रखने के लिए भरोसे की, विश्वास की नींव का होना बेहद ज़रूरी है। परंतु बिना किसी ग़लती के सुनंदा जो सज़ा रोज़ भुगत रही थी उसका क्या? वो विक्रम को समझा-समझा कर थक चुकी थी। और यादवी रोज़ अपनी माँ के आँसू अपनी आँखों में भर रही थी। यादवी के लिए अब ना तो उसके पिता कोई मसीहा थे, और ना ही वो कभी उनसे किसी बात की सिफ़ारिश करती। पाँच से कब वो पच्चीस की हो गयी ये वो भी नहीं समझ पाई। हाँ, उसे ये ज़रूर याद है कि उसकी माँ ने कितने दुख सहे हैं, उसकी माँ के शरीर पर कितने ज़ख़्म दिए गये हैं, कितना डर है उसकी माँ के हर एक लफ्ज़ में, आज उन ज़ख़्मों को भी पच्चीस वर्ष हो गये हैं। वो ख़ुद के शब्दों को किसी के साथ बाँटना चाहती है। एक बेजान मूरत को लिए हर दरवाज़े पर वो दुत्कार की मार सहन कर रही है।

सुनंदा, आज एक ऐसे निर्जीव शरीर को ढो रही है जिसके किसी भी अंग में जीने की कोई चाह नहीं रही। उसकी साँस तो चल रही है पर धड़कन कब अपनी मर्ज़ी कर बैठे कुछ नहीं पता।

"विश्वास आज मात्र एक शब्द बनकर ही रह गया है। एक ऐसा शब्द जिसके टूटने से पल में रिश्ते बिखर जाते हैं। एक ऐसे धागे में उसके कच्चे मोती पिरोए जाते हैं जो कभी भी टूट कर बिखर सकता है। काश! लौट आए वो विश्वास फिर से जिसमें कोई शर्त ना हो, कोई दो पहलू ना हों, कोई धड़कन ऐसी ना हो जो थमने का इंतज़ार कर रही हो, कोई साँस ऐसी ना हो जो दूसरी साँस के इंतज़ार में बैठी हो, कोई कच्चा मोती किसी धागे में ना पिरोया जाए और ना ही कोई ऐसा वाक्य हो कि ‘काश! लौट आए वो विश्वास…!"


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