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ISSN 2292-9754

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01.27.2019


काग़ज़

“मेरा नाम काव्या है। पंजाब के छोटे से शहर से आई हूँ। बड़ी दिल्ली से चार बाइ चार की जगह भी बड़ी मुश्किल से मिली। बड़े दिलवालों की इस नगरी ने इतनी जगह दी - शुक्रगुज़ार हूँ दिल्ली! आसान तो नहीं था फिर भी ले ली। बड़े ख़्वाब देखना, आदत है छोटे शहर वालों की। क्या करें आदत से मजबूर मैंने भी देखे बड़े ख़्वाब। बस उन्हीं को पूरा करने के लिए निकल पड़ी। एक दिन मुझे एक फोन आया और दिल्ली में कॉल सेंटर में नौकरी पक्की हो गयी। तनख़्वाह हैसियत से ज़्यादा थी। समय से नौकरी की तलाश भी थी, तो ख़ास पूछा नहीं। स्नातक पास को इतनी तनख़्वाह की नौकरी, क़िस्मत के सितारे गर्दिश से उभरते नज़र आए। दिल्ली में आने पर क़िस्मत का पहला पलट वार; जिस नौकरी के लिए बुलाया गया था उसका रूप ही बदल गया। नौकरी किसी कॉल सेंटर की नहीं बल्कि एक होटल रिसेप्शनिस्ट की थी।

“6 दिसंबर, ये तारीख़ ज़ेहन से कभी नहीं जाएगी। घर पर बताया था तो माँ को चिंता के बादलों ने घेर लिया। इतना बड़ा शहर है, अकेले कैसे रहेगी? सुख-दुख में कौन होगा? वगैरा... वगैरा...। वैसे मैं अपने घर पर बहुत सुख-सुविधाओं में थी, खाने के समय खाना, अच्छा पहनना, हर सहूलियत थी वहाँ। फिर...? मैं भाग किस बात से रही थी? ऐसा क्या था जो मेरे क़दमों को वहाँ रुकने नहीं दे रहा था? घर में मैं और मेरी माँ, बस यही परिवार है मेरा। बाप चला गया हमें छोड़ कर। पता नहीं मेरी माँ क्यों उम्र भर उसकी पूजा करती रही? उसके हर झूठ पर परदा डालती रही? उसके हर गुनाह को मुझसे छिपाती रही। ना जाने क्यों...? मेरी माँ अपने समय यानी 1960 में ग्रैजुएट थी और मेरे बाप से बहुत ज़्यादा पढ़ी-लिखी। शायद इसी बात का मेरे बाप को रंज था कि उसकी बीवी उससे ज़्यादा शिक्षित क्यों? और सुंदर तो हद से ज़्यादा!

“पुरुषों को इस बात से बेहद परेशानी होती है कि उनकी पत्नी उनस सुंदर क्यों? ऐसी परेशानी है तो भई शादी ही मत करो। राह चलते उनकी पत्नी को झलक भर देख ले कोई तो पत्नी जी की तो जान पर बन आती है। पहला प्रश्न जो मर्दों की मानसिकता को दर्शाता है, “वो तेरा क्या लगता था?”, “आज के बाद तू इस घर की दहलीज़ नहीं लाँघेगी।”

“कई बार तो माँ को मैं कह भी देती थी कि “कैसी-कैसी राम मिलाए जोड़ी”। इस बात पर मुझे बहुत डाँटती थी, वो कहती थी कि तू अपने पिता के बारे में ऐसा नहीं बोलेगी। मैं कहाँ मानने वाली थी।

“सच को झुठलाने का अर्थ है झूठ को बढ़ावा देना। सच के साथ चलो, उसके बाद नहीं। सच सबको हज़म नहीं होता। सबमें इतना धैर्य कहाँ कि सच की कसौटी पर उतर भी पाएँ। खरा-खोटा होना तो बहुत दूर की बात है।

“माँ रोज़ उस शैतान की पूजा करती और वो रोज़ अपनी पुजारिन को लात मारता। मैं 10 बरस की थी जब मैंने पहली बार माँ की चीख सुनी थी। परंतु उसने उस जुर्म पर झूठ की परतें चढ़ा दीं। फिर तो रोज़ का सिलसिला हो गया। मेरा विरोध पिता का अपमान समझा गया। एक दिन उसने माँ की चमड़ी को लाल रंग से भिगो दिया। आस-पड़ोस भी उस दरिंदे की इस हरकत पर आँसू बहा रहा था। बस आँसू ही बहा रहा था। कोई कुछ कर नहीं रहा था। उस दिन पहली बार मैंने माँ के लिए आवाज़ उठाई और उसी रात उस आवाज़ को दबा दिया गया। मर्दानगी दिखाते हुए बाप ने।

“नफ़रत हो रही थी ख़ुद से। एक लड़की होने पर नफ़रत। मैं ख़ुद से दूर जाती भी तो कहाँ? कोई और ठिकाना था ही नहीं। फिर एक दिन ख़बर मिली कि उस दरिंदे को रेलगाड़ी अपने साथ ले उड़ी। थाने में शिनाख़्त के लिए जब बुलाया गया तो माँ नेउसे अपना पति मानने से इनकार कर दिया। हैरान थी मैं कि अचानक माँ में ये बदलाव कैसे? उसने अपने भगवान को पहचानने से इनकार क्यों किया? पूछने पर बोली कि

“यह विरोध मुझे बहुत पहले कर देना चाहिए था।”

“परंतु अब क्या लाभ?” मैंने कहा।

“माँ चुप थी। वो क्रांति करना चाहती थी पर कभी कर नहीं पाई। ना तो उसके जीते जी और ना ही जाने के बाद। माँ को अकेला छोड़कर मैं दिल्ली आ तो गयी पर यहाँ भी मर्दों की हैवानियत ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा।

“सोचती हूँ कि लड़की होना इतना ही बड़ा गुनाह है, तो सही हैं वो लोग जो इसे जन्म से पहले ही मार देते हैं। कम से कम उसके जन्म के बाद उसे ये मानसिक और शारीरिक यातनाएँ तो ना झेलनी पड़ेंगी। अगर बेटी को जन्म देना है तो जीने का अधिकार भी दो, उसे ग़लत से लड़ने की शक्ति दो। अन्यथा मार डालो!

“जहाँ नौकरी करती थी वहीं का प्रबंधक एक चेहरे से इंसान और दूसरे से हैवान था। कई बार तो ऐसा लगने लगा था कि हर मर्द में मेरा बाप ही मौजूद है। शायद इसीलिए आज तक मैं किसी पर भरोसा नहीं कर पाई।

“अब मैं, ख़ुद को तोड़ने का हक़ किसी को नहीं दूँगी।”

“शारदा तुम्हारे कहने पर मैंने अपनी व्यथा को एक कथा का रूप तो दे दिया है। परन्तु क्या इसे पढ़ कर लोग शांत रहेंगे। क्योंकि ये समाज मर्दों की दुनिया है और मर्दों की इस दुनिया में स्त्री का कहीं भी अस्तित्व नहीं है।”

“तुम बहुत पहले की बात कर रही हो काव्या। आज के समय में स्त्री हर काम में मर्दोंं से आगे है।”

“बहुत...? कितना समय? अभी कुछ ही समय पहले की बात है।”

“कुछ ही समय? मतलब?”

“मतलब। अभी एक वर्ष ही तो हुआ है मुझे दिल्ली आए।”

“नहीं काव्या। तुम पिछले पंद्रह वर्षों से कोमा में थी और इन वर्षों में समय ने बहुत सारे पासे पलट दिए हैं।”

“पंद्रह वर्ष...? मैं इतने समय से... माँ कैसी है...? कहाँ है...? और मैं कोमा में...? कैसे...?"

“जब प्रबंधक ने तुम्हें कमरे में बुलाया था। तब वहाँ एक और इंसान भी मौजूद था।”

“कौन?”

“मैं।”

“तुम?”

“हाँ, तब मेरा वहाँ आना महज़ एक इत्तफ़ाक़ कह सकती हो। मैं वहाँ उससे अपने पत्र लेने आई थी। जब वहाँ तुम्हें देखा तो मैं घबरा गयी। मैंने उसपर वार करने के लिए लोहे की एक रॉड उठाई और तुमने भी। परंतु परिस्थिति कुछ ऐसी हो गई कि तुम्हारी रॉड तो प्रबंधक को लग गयी और मेरी तुम्हें और तुम कोमा में चली गयी। तुम्हें हस्पताल दाख़िल करवाया और पुलिस को ख़बर की। माफ़ी चाहती हूँ काव्या। तुम्हारी माँ अब इस दुनिया में नहीं रही। बीते वर्ष वो हमें छोड़कर चली गयी। तुम्हारे लिए ये ख़त छोड़ गयी है।”

काव्या ने भरी आँखों से उस ख़त को खोला...।

“प्रिय काव्या,

जब तक तुम इस लोक को देखोगी, तब तक मैं दूसरे लोक में जा चुकी हूँगी। एक सच्चाई जो तुम नहीं जानती बताना ज़रूरी है। मैं तुम्हारी सगी माँ नहीं हूँ। तुम्हारी सगी माँ मेरी बड़ी बहन नीलम थी जो छह महीने की बच्ची को मेरी गोद में छोड़कर चली गयी। तुम्हारे पिता का मुझसे विवाह एक समझौता था। जिसके अनुसार मैं तुम्हारा पालन पोषण करूँगी और तुम्हारे पिता को बेटा दूँगी। मैं इस बात के लिए तैयार नहीं थी। परन्तु जब मैंने एक नन्ही परी को अपनी आँखों के सामने देखा तो सब भूल गई। शादी के एक वर्ष मेंं मैं गर्भवती हो गयी। तुम्हारे पिता ने मुझे जाँच करवाने के लिए कहा। मेरे इनकार करने पर बड़े प्यार से समझाया कि हमारे हालात ऐसे नहीं हैं कि हम एक और बेटी की ज़िम्मेदारी ले सकें। मैं, भावनाओं में बह गयी। जाँच करवायी तो पता चला कि गर्भ में बेटा है। अभी मैं दो महीने की गर्भवती थी, तुम्हारे पिता को उसकी माँ से बात करते हुए सुना कि “जिस तरह इसकी बड़ी बहन को ख़त्म किया है वैसे ही बेटा होने के बाद इसे और उस छोकरी को भी ख़त्म कर देंगे।” मैंने तुरंत फ़ैसला किया। हस्पताल गयी और गर्भपात करवा लिया। मानती हूँ ये ग़लत था पर मेरे पास और कोई विकल्प ही नहीं था। आगे कोई और कोशिश ना कि जाए इसलिए इस क़िस्से को ही खत्म कर दिया। घर लौटने पर जो होना चाहिए था वही हुआ। तुझे काफ़ी समय तक इन सब बातों से दूर रखने में सफल रही परंतु उस दिन तूने सब देख लिया था। उसके बाद का तुम्हें सब पता है। आशा करती हूँ कि तेरी आँखें जल्द इस दुनिया देखें और जब तुझे मेरा ख़त मिले तो मुझे याद करना।

तुम्हारी माँ

“मैं उस ख़त को सीने से लगाकर उम्र भर के आँसू रोने लगी। माँ को इतना कुछ कहती रही और वो मेरी सगी ना होते हुए भी मेरे लिए इतनी क्रांति करती रही।

“किससे कहूँ?
कैसे कहूँ?
ये वो ज़लज़ला है
जो कोई सँभाल नहीं पाएगा
बारूद के ढेर पर है पाँव
एक चिंगारी से सब
ख़ाक हो जाएगा।”

मेरा जीवन वो काग़ज़ है जो बारूद के ढेर पर रखा हुआ है। जल भी रहा है और राख भी नहीं हो रहा परंतु तपिश बरक़रार है।


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