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ISSN 2292-9754

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01.10.2016


बस स्टॉप पर......

बस स्टॉप पर खड़ी
संगीत की जादुई दुनिया में डूबी
बेख़बर उन नज़रों से
जो मेरे लिए अनजान थीं,

मुझे कुछ यूँ स्कैन कर रही थीं
कि मैं ख़ुद ही में सिमट कर रह गयी,
घबराई, काँपी, मेरी ध्वनि ने
कुछ कहना चाहा
पर...

दुपट्टे को शॉल की तरह ओढ़ते हुए
अपने अस्तित्व की रक्षा करने लगी।
काँपते हाथों ने
बैग को खोलने का बहाना किया.
दाएँ-बाएँ देखते हुए
ये देखना चाहा कि
उसे, मुझे देखते हुए किसी ने देखा तो नहीं..
आस थी कि
अब तो वो नज़रें मुझ पर से हट चुकी होंगी..

हिम्मत की...
पर मैं फिर से ग़लत थी
बिना किसी शर्मो-लिहाज़ के
वो कर रहीं थी मेरी आबरू का अपहरण।
मैं बेबस, लाचार, सिकुड़ती रही...
और सिकुड़ती रही...
बस स्टॉप पर...


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