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ISSN 2292-9754

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01.10.2016


बुद्धा जी….

“ओये हैपी सिंग… क्या हाल चाल है.. कहाँ रहते हो जी.?”

“कहीं नहीं जी.. आप बताओ.. इतने दिनों के बाद यहाँ का रास्ता कैसे भूल गये। अब तो आप जी दिल्ली वाले हो गये हैं.. क्यूँ जी? ठीक कहा ना…?”

और दोनों के चहरों पर हँसी बिखर गयी।

“अच्छा जी, अब यह बात हो गयी.. हम्म…।”

दोनों बहनों की तरह रहती थीं। मुलाकात को अभी एक वर्ष ही हुआ था। पर दोनों ने अपने दिल का हर राज़ एक दूसरे के साथ सांझा किया था। कीर्ति ने तो अपने जीवन की सारी किताब हरप्रीत से सांझी की थी। हरप्रीत और कीर्ति के जीवन में कुछ ऐसी बातें हुईं थी जो वो किसी और को बता नहीं पातीं थीं।

“मैं तुझसे नाराज़ हूँ हैपी सिंग। तूने अपने जन्मदिन की पार्टी में मुझे न्यौता नहीं दिया…।”

“अच्छा .. तो ठीक है तेरी नाराज़गी दूर करने के लिए हम आज ही हमारी फेव्रेट जगह पर चलते हैं। याद है…”

“बिल्कुल याद है..।”

“तो चलें फिर .. हमारे ‘बुद्धा जी’ के पास.. ।”

हरप्रीत और कीर्ति अक्सर अपनी दुविधाओं का हल ढूँढने के लिए बुद्धा जी के पास चली जाती थीं। ये कोई संत या महात्मा नहीं थे। बल्कि संतों के संत और महात्माओं के महात्मा थे.. बुद्धा जी। झील के किनारे बुद्धा जी हमेशा इनकी बातें सुनते और रास्ता भी दिखाते।

“याद है कीर्ति. हम बुद्धा जी के पास लास्ट टाइम कब गये थे?”

“15 ऑगस्ट को। इनडिपेंडेन्स डे मनाने के लिए। और उस दिन उनके पास कोई भी नहीं था। और उसी दिन मेरी मुलाकात..”

और अचानक से चुप्पी…

“आई एम सॉरी। मैंने तुम्हें ये बात याद दिलाने के ख्याल से नहीं कहा था। आई एम रियली वेरी सॉरी...!”

“नहीं यार.... सॉरी की कोई बात ही नहीं है। मैं जानती हूँ तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है और तू हमेशा मुझे खुश ही देखना चाहती है। पर एक बात की हमेशा में रब्ब से शिकायत करती हूँ कि जिनका साथ लिखा ही नहीं है तो रब्ब हमें उनसे मिलवाता ही क्यूँ है? हार गयी हूँ मैं…। हम उस राह पर अक्सर चलना नहीं चाहते जहाँ हमें पहले ठोकर मिली हो। शायद इसीलिए…”

और कीर्ति के चेहरे पर उदासी की परछाई मंडराने लगी।

सिक्के का पासा पलटते हुए हरप्रीत ने माहौल को खुशनुमा बनाते हुए कहा कि ..

“और एक बार तो मैं भी यहाँ मिली थी किसी से… पता है कौन…?”

“कौन?”

“हमारे हॉस्टिल की वॉर्डन से…।”

“क्या मतलब?”

“अरे यार हम हॉस्टिल से भाग कर झील आ गये थे। और हॉस्टिल में गार्डियनस के नाम की एंट्री कर दी थी। पता नहीं कैसे वॉर्डन को पता चल गया और वो हमें सूँघते हुए यहाँ चली आई। आज तक मैं उस गद्दार को ढूँढ रही हूँ। जिस दिन मिल गया छोड़ूँगी नहीं…।”

हरप्रीत ने बाहर का माहौल तो बदल दिया था। पर अंदर के तूफान को कौन शांत करे। पुरानी बातों को अक्सर थोड़ा सा कुरेदने मात्र से ही उन पर पड़ी सारी धूल हट जाती है और वो जख़्म फिर से हरे हो जाते हैं।

“मैं भी उसी गद्दार को ढूँढ रही हूँ.. जो…”

हम हमेशा से ही अतीत में जीते हैं। वर्तमान अच्छा होते हुए भी भविष्य को अच्छा बनाने की चाह ना होते हुए हम भूत में क्या हुआ था उसका अफ़सोस करते हैं। जबकि होना कुछ यूँ चाहिए की वर्तमान में जियो और भविष्य को बेहतर बनाओ। हाँ, अपनी तरफ से ईमानदार रहो। ताकि कभी गद्दारी का इशारा तुम्हारी ओर ना हो सके।

कीर्ति और हरप्रीत आज अपनी किसी भी मुश्किल को सुनाने नहीं गये थे। बल्कि बुद्धा जी से अपनी खुशी बाँटने गये थे। कीर्ति का चयन दिल्ली में हो गया था पीएच. डी. के लिए और हरप्रीत को अपने जीवन का पहला और अहम पुरस्कार मिलने वाला था। हरप्रीत एक एन जी ओ में काम करती थी। भूले भटकों को सही राह पर लाना ही उसका एक मात्र लक्ष्य था। उसके एन जी ओ में उससे बड़ी उमर के बहुत से अनुभवी लोग काम करते थे। पर हरप्रीत ने अपनी एक अलग ही पहचान बनाई थी। और उसे चंडीगढ़ सोशल वेलफेर बोर्ड की तरफ से बेस्ट वालंटियर का पुरस्कार दिया जा रहा था। कीर्ति का जीवन कुछ पाँच वर्षों के लिए ठहर गया था। इस लंबे अंतराल ने उसके जीवन को अब एक नयी दिशा दी है। अब वो जिस राह पर चल रही है वो उसकी अपनी राह है, किसी की कोई दखल अंदाज़ी नहीं है। हरप्रीत करती तो मन की ही पर कई बार उसे अपने परिवार के लिए अपने मन को मारना भी पड़ा।

कीर्ति और हरप्रीत अपनी खुशियों की माला में सुकून के मोती पिरो ही रहे थे कीकि अचानक एक धुँधला सा चेहरा साफ होता उनकी ओर बढ़ता गया...

“तुम… तुम यहाँ क्या कर रहे हो? चले जाओ यहाँ से! मैं तुम्हारी शक्ल भी नहीं देखना चाहती!”

“मेरी एक बार बात तो सुन लो….”

“मैंने कहा ना… लीव… राईट नाओ…!”

“कम से कम उसकी एक बार बात तो सुन लो..!”

“ये तू कह रही है हरप्रीत? क्या तुझे नहीं पता कि मैं किन मुश्किलों में थी और अकेले मैंने कैसे सबका सामना किया था? अब और मैं खुद को दुख नहीं देना चाहती। और वैसे भी तुम्हें यहाँ बुलाया किसने है..? हरप्रीत क्या तूने इसे बुलाया है..?”

“नहीं यार.. मैं ऐसी भूल कैसे कर सकती हूँ... दर्द क्या होता है मैं अच्छे से जानती हूँ।”

“मुझे यहाँ किसी ने नहीं बुलाया है। यहाँ से गुज़र रहा था तो मन किया कि कुछ समय यहाँ बैठ कर अपने जीवन के अर्थ ढूँढ लूँ। तुम्हें देखा तो…”

“तो क्या..? देख लिया अब दफ़ा हो जाओ यहाँ से.. इससे पहले कि मैं कुछ और कह दूँ चले जाओ..!”

“प्लीज़ तुम चले जाओ यहाँ से.. कीर्ति पहले ही इस बात को ले कर बहुत परेशान है। इतने साल हो गये पर अभी तक वो इस हादसे से उभर नहीं पाई है। चले जाओ यहाँ से!”

“पर.. मुझे एक बार बात करनी थी..”

“क्या बात करनी है तुम्हें.. हाँ.. बोलो.. जब बात करनी चाहिए थी तब तो की नहीं अब जनाब बात करना चाहते हैं..!”

“देखो कीर्ति..”

“लीव आई सैड…लीव…!”

और राघव को एक ऐसी नज़रों का सामना करना पड़ा जिसमें क्रोध की लालिमा तो थी ही पर साथ ही आँसू भी छलक रहे थे। ऐसा एक ही परिस्थिति में होता है जब आप किसी से बेइंतेहा मोहब्बत करते हों और वो आपका साथ छोड़ कर यूँ चला जाता है कि जैसे आपसे कभी मुलाक़ात भी ना हुई हो। कीर्ति के जीवन में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। राघव ने उसका हाथ तब छोड़ा जब उसे सबसे ज़्यादा उसकी ज़रूरत थी। और आज जब वो लौट आना चाहता है तो ये संभव नहीं है। आज कीर्ति के जीवन में जब सारी खुशियाँ दस्तक दे चुकी हैं तो वो क्यूँ अपने अतीत को फिर से गले लगाए और ऐसे अतीत को जो कभी साथ ही नहीं था…?

आज राघव उसका वर्तमान और भविष्य बनना चाहता है पर अब ये संभव नहीं है। अब कीर्ति के जीवन में वो सारी खुशियाँ दस्तक दे चुकी हैं जिनकी वो हकदार है। भले ही देर से मिलीं पर मिलीं ज़रूर। कीर्ति अपने आज के साथ बहुत खुश है। अपने आदित्य के साथ…!

“तुम मेरी जगह पर रह कर सोचो तो समझ आ जाएगा कि मैंने ऐसा क्यूँ किया?”

“ना मेरी जगह पर किसी ने आ कर देखा और ना ही मैं किसी की जगह पर आ कर सोचूँगी। और अब अगर तुम एक मिनिट भी यहाँ रुके तो मैं इंसानियत तक की हद भी पार कर दूँगी...!”

और राघव वहाँ से अपना सा मुँह ले कर चला गया...!

“कीर्ति, मैं जानती हूँ तूने जो किया वो आसान नहीं था। पर इतनी कठोरता से…।”

“हाँ हरप्रीत... बुद्धा जी कहते हैं कि..

“थ्री थिंग्स कैन नॉट बी लोंग हिडन:

द सन

द मून

द ट्रूथ!

“और मेरे जीवन का सच भी अब मुझसे छिपा नहीं है। आज का सच आदित्य है। और ये सच मैं मान भी चुकी हूँ और मैं इस सच से बेइंतेहा प्यार भी करती हूँ। मैं और कुछ नहीं जानना चाहती अब।

उतार चढ़ाव जीवन का हिस्सा है। और हमें इनसे खुद ही निपटना होता है। हाँ ये बात सही है कि एक अच्छे हमसफ़र के होने से उनका पता नहीं चलता। मैं आज तक यही सोचती रही कि मेरे प्यार में कमी थी। पर नहीं, राघव इसके लायक ही नहीं था। ये दुविधा भी मेरे अंदर थी और इसका हल भी। हर मुश्किल का हल हमारे भीतर ही होता है। बुद्धा जी कहते हैं ना…

“द वे इज़ नॉट इन द स्काई.

द वे इज़ इन द हार्ट!”


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