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ISSN 2292-9754

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01.10.2016


अक्सर यूँ होता है.....!!

व्यक्ति जब किसी और की उलझन को सुलझाने का प्रयास करता है फिर भले ही वो कोई मित्र हो, सगा-संबंधी हो, या फिर कोई अजनबी..... यूँ ही कोई मन की उलझन को बाँट रहा हो, और जब आप उनकी दुविधा को सुनते हैं, तो कहीं न कहीं से उसमें आप ख़ुद को खड़ा पाते हैं। आपके जीवन के कुछ पहलू कई बार आपके सामने यूँ ही आ जाते हैं, जिन्हें आपने कभी किसी के साथ नहीं बाँटा होता। कोई भी उस घटना से परिचित नहीं होता और ना ही उसका कोई गवाह होता है, सिवाए आपके या आपके ख़ुदा के। ऐसी एक नहीं अनेक घटनाओं ने हर व्यक्ति के जीवन में दस्तक दी होती है जिनके कड़वे घूँट केवल व्यक्ति स्वयं ही पीता है।

सुचिता....., आपके लिए ये केवल एक नाम है, परंतु इससे मिलने पर इसकी दुविधा को सुनने पर, मैं ख़ुद से कहीं फिर से परीचित हो गयी। दोपहर के दो बजे थे, सूर्य की किरणें वृक्ष की शाखाओं और पत्तों से बचती हुई, चमकती तेज़ बिजली की तार की भाँति मुझ पर पड़ रही थीं। कुदरत के इस इशारे से बेख़बर कि उसकी मुझपर असीम कृपा है, मैं उन किरणों को केवल धूप समझ कर चेहरे पर हाथ से छाया करती रही। मुझे इस बात का ज़रा सा भी एहसास नहीं था और मैं कुदरत से यूँ ही नाराज़ बैठी थी।

सुचिता आई, मेरे पास बैठी और कुछ नहीं कहा, बस..... रोने लगी। उसके रोने की वज़ह से बेख़बर थी मैं.....। बहुत कहने पर, मनाने पर वो कुछ चुप सी हुई पर वो सिसकियाँ फिर भी भरती रही....। आस-पास के लोग क्या सोचेंगे, इसी बात से परेशान मैंने उसे डाँटते हुए कहा, "तू अब चुप कर जा वरना मैं चली।"

थी तो वो एक खोखली धमकी ही पर काम कर गई। उसके चुप होने पर मैंने उसे पानी पिलाया। उसके कंधे पर हाथ रखते हुए मैंने पूछा, "ऐसी क्या बात हो गई कि इतनी बहादुर और निडर लड़की रो रही है।" क्योंकि जहाँ तक मैं उसे जानती थी, होस्टल में जब भी उससे मुलाकात होती थी वो चहकती, चिल्लाती और ऊट-पटाँग हरकतें करती ही मिलती थी। उसे देख कर कोई ज़रा सा भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता था कि उसे कभी कोई दुख भी हो सकता है। पर कई बार ये बात भी मन में आती थी कि "मुस्कुराते चेहरों के पीछे अक्सर ख़ामोशियाँ छिपी होती हैं"। शायद उसे सच में कोई दुख नहीं था या फिर वो दुख छिपाने की कला में माहिर थी।

मेरी बात सुन कर उसने अपना चेहरा ज़रा सा ऊपर किया, तो उसकी आँसुओं से भीगी आँखें मानो मुझसे बहुत कुछ कह रही हों। पर उन शब्दों को मैं पढ़ नहीं पा रही थी। मैंने उसे बात को साफ-साफ कहने के लिए कहा।

आख़िर , लंबी साँस लेते सुचिता बोली -

"सुधीर...।"

“सुधीर...?" ये नाम मेरे लिए नया था। सुचिता से होस्टल में मुलाकात होती रहती थी, पर कभी इतने ख़ास दोस्त न बन पाए थे हम। होस्टल छोड़ने के कुछ साल बाद फेसबुक पर मिले थे, बस वहीं से बातें चलती थी और फिर फोन पर।

"सुधीर कौन...?" मैंने हैरानी से पूछा।

"तुम उसे नहीं जानती। वो मेरे साथ पढ़ता था, कब हम दोनों में प्यार हो गया पता ही नहीं चला," सुचिता बोली।

"तो इसमें रोने की क्या बात है," मैंने पूछा।

मेरे ये कहने की देर थी कि उसकी सिसकियाँ फिर शुरू हो गईं। मैंने फिर से खीजते हुए कहा, "देखो सुचिता यदि समस्या बताओगी नहीं तो उसका समाधान कैसे मिल पाएगा।"

सिसकियों की गति धीमी हुई और वो बोली, “मैं सुधीर को 4-5 सालों से जानती हूँ। शादी का वादा किया था उसने, परंतु अब उसे और समय चाहिए।"

माजरा क्या था, बहुत हद तक समझ में आ चुका था। बस फिर क्या था मेरे अंदर का ज्वालामुखी फट पड़ा, और लावा बन कर बाहर आने लगा। उस क्षण के बाद सुचिता बस मुझे सुनती रही.... बस सुनती रही.....

शायद उस समय मेरे अंदर की सुचिता कहीं भड़क उठी थी। क्योंकि काफ़ी वर्षों से मैंने उसे सोने के लिए मजबूर किया हुआ था। मैं नहीं चाहती थी कि वो कभी किसी के सामने आए। क्योंकि बहुत कम लोग जीवन में आपको समझते हैं और मुझे समझने वाला शायद इस दुनिया में कोई नहीं है, कोई भी नहीं.......। मेरे लिए प्यार की परिभाषा अब पूरी तरह से बदल चुकी थी। जिस प्यार को मैं तोहफा मानती थी, आज उसे मैं एक ढकोंसला मानती हूँ.... । केवल एक ढकोंसला....।

सुचिता के चेहरे पर केवल ख़ामोशी थी, और मेरा चेहरा लाल पड़ चुका था। आईना होता तो शायद खुद को देख कर रो पड़ती। नहीं जानती थी कि मैंने सुचिता से जो कहा वो क्यूँ कहा, किस हक़ से कहा। जानती हूँ तो सिर्फ़ इतना कि अपने अंदर की सुचिता को उस दिन मैं छिपा नहीं पाई।


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