शिवानन्द सिंह सहयोगी

कविता
अनगिन बार पिसा है सूरज
कहो कबीर!
कोई साँझ अकेली होती
घिर रही कोई घटा फिर
बन्धु बताओ!
शब्द अपाहिज मौनीबाबा
सुख की रोटी
सुनो बुलावा!