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01.26.2008
 

जहाँ चाह, वहाँ राह
डॉ. शिवनन्दन सिंह यादव


एक मार्ग खो गया
तो दूसरा नहीं मिला!
ऐसा कब हुआ कहीं
कि कोई पथ नहीं मिला।

दुख मिले, सुख मिले,
शत्रु - मित्र सब मिले,
जीवन की राह में,
धूप-छाँव संग चले,

मुक्ति मिल सके जहाँ
वह क्षितिज नहीं मिला!

सत्य को असत्य को,
बुद्धि कैसे जानती?
धर्म को अधर्म को
कैसे पहचानती?

सत्व-तत्व का प्रमाण
जब कहीं नहीं मिला!

कर्म जो मिला, किया
मर्म जो लगा, जिया,
प्यास में कभी अपेय
जानमान कर पिया,

नर्क स्वर्ग का निदान
अन्त तक नहीं मिला!

साधना में कोटि-कोटि
जीवन व्यतीत हुए
भाव - सिन्धु मन्थन में
युग - युग अतीत हुए।

प्राण खोजता रहा
पर अमृत नहीं मिला!

एक राह खो गयी
तो दूसरी नहीं मिली,
घूमती रही विपन्न
आस चिर गली-गली

तीर्थ-धाम सब किये
किन्तु कुछ नहीं मिला!


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