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ISSN 2292-9754

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03.14.2015


व्यथित मन की अरदास

बलात्कार
संत्रास, आघात
अभिशाप
क्रूर संवेदना का चीरता
अट्टाहास
मर गयी है आत्मा मर गए हैं लोग
ज़िन्दगी के नाम पर छल रहे हैं लोग
विकृत मानसिकता का एक और परिहास
बलात्कार
सिर्फ नारी ही क्यों जल रही इस आग में
दानवों की फ़ौज रह रही है मौज में
चीरी गयी लाज पर हो रहा है संवाद
बलात्कार
तन का नहीं मन का आत्मा के अंश अंश का
भोगते उस दर्द का चुभते तिलमिलाते दंश का
न्याय की आड़ में चल रहा है खिलवाड़
बलात्कार
उठ गया है विश्वास, नहीं रही रिश्तों में लाज
तोड़ती वर्जनायें, डर रही हर बेटी आज
देवी भी दर्शनों को, है नहीं अब तैयार
बलात्कार
पूछती हूँ प्रश्न मैं, है कहाँ सवेदना
काँपती है कोख भी, देने को जन्म यहाँ
हो न जाए दानव कहीं, करवा रही है गर्भपात
बलात्कार
चीरते जिस जिस्म को, वो माँ बहन बेटी तेरी
आज नहीं तो कल, आ सकती है बारी तेरी
कैसे नज़र मिलाओगे, चीखोगे चिल्लाओगे
बलात्कार
कोई नहीं सुनने वाला, तिल तिल कर मरते जाओगे
जब वक़्त पलट कर आयेगा, तुम्हारा किया तुम्हें दिखाएगा
तब कैसे सह पाओगे
बलात्कार
सोचती हूँ कब तलक,अस्मिता कुचली जायेगी
कब बुझेगी आग ये, कब मिटेगा संताप ये
ये नागफनी ज़हरीली है, फिर से पनप ही जायेगी
बलात्कार
दे सको तो मान दो, आँखों में शर्म दो
धन से कही ज़्यादा, संस्कारों की शान दो
आने वाली नस्ल को, इंसान की पहचान दो
मान की सम्मान की अधिकारिणी है वो
इस सच को समझाने की
बस मन में ठान लो .........
बलात्कार .....


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