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ISSN 2292-9754

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04.01.2015


समर्पण

पग पायल की झंकार सखी नैनों का तीखा वार सखी
अधरों पर मीठी मीठी सी प्रिय की निश्छल मनुहार सखी

यूँ यादों में आकर मुझ को हौले से छू लेना उनका
ये कैसा बंधन साँसों का बज उठते मन के तार सखी

ना कहकर भी सब कुछ कहना नैनों से नैनों को पढ़ना
ये कैसी तड़पन है मन की, प्यारा सा ये इज़हार सखी

ग़ज़लों में धड़कन सरगम सी गीतों ने पाई चंचलता
जो रूठूँ पल भर को भी मैं, करते मेरी मनुहार सखी

सर्वस्व समर्पण कर के भी कुछ शेष अभी क्यूँ लगता है
ये कैसी चाहत जीवन की, पाना है उनका प्यार सखी


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