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ISSN 2292-9754

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12.03.2015


पीड़ा से इक आँसू फूटा

पीड़ा से इक आँसू फूटा
दिल जाने कब कैसे टूटा

मन की पीड़ा मन में चुभती
अपना बन अपनों ने लूटा

नासमझे तुम विधि का लेखा
अपनों से जब नाता छूटा

पौधा रोपा नागफनी का
फूलों का खिलना है झूठा

जैसी करनी वैसी भरनी
मिलता फल तो क्यों है रूठा

फूलों को जो बोया होता
खिल जाता हर बूटा बूटा


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