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ISSN 2292-9754

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04.01.2015


पीड़ा टीसती है

पीड़ा
भेदती
चीखती
चिल्लाती
गहन बहुत गहन
गह्वर
मन के अँधेरे
कोनों में सिसकती
बिना आवाज़
मूक
बिलकुल मूक
फिर भी
चीरती है
दिलों को
तोड़ देती है
सारे तटबंध
शब्दों से
न भावो से
बस
कुचलती है
निचोड़ के रख देती
हर भाव
न आँसू
न सहानुभूति
बस वो नाचती है
अपनी धुन पर
मसलते हुए
हृदय को
पीड़ा
टीसती है
गहन बहुत गहन
चमकती रोशनियों में भी
पीड़ा .....?


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