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ISSN 2292-9754

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12.03.2015


मुक्तक-१

[१]
गुनगुनी सी चाहतों में चूड़ियों की चहक तुम
फागुनी झोंका हवा का मौसमों की दहक तुम
बावरा होने लगा मन चितवनों के तीर से
प्रीत की इन बारिशों में ज़िंदगी की महक तुम
[२]
ना रुकी हूँ ना रुकूँगी मैं सतत चलती रहूँगी
धार हूँ तलवार की मैं वार यूँ करती रहूँगी
रुख हवा का मोड़ दूँ बदलाव की किरणें बिखेरूँ
बन समय की लेखनी इतिहास मैं रचती रहूँगी
[३]
दर्द, क्षोभ, क्रोध, लोभ, मानवता लाचार है
हर विनाश का परिणाम बस ये संघार है
प्रेम ही एक मन्त्र है आस औ विश्वास का
जीवन के नव सृजन का बस ये आधार है
[४]
इस काया में ऐसा क्या है एक दिन तो जल जाना है
मिट्टी से बना हुआ तन है, मिट्टी में ही मिल जाना है
सच है लेकिन कटु है बड़ा, ये ही फ़साना जीवन का ..
लाख सजा ले इस काया को, यौवन तो ढल जाना है


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