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ISSN 2292-9754

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03.14.2015


बंद किवाड़ों से अक्सर

बंद
किवाड़ों से
अक्सर
वो
पगली
मुझे बुलाती है
खुली हवा
अधिकार नहीं
पत्थर से
मारी
जाती है
टूटी फूटी
झिरकी से
घुटती
साँसों की आवाज़ें
धर्म
प्यार,
लाचारी के
किस्से
मुझे सुनाती है
दुनिया से
वो
छली गयी
दुनिया ही
सज़ा सुनाएगी
अजब
विडम्बना
जीवन की
वो
हँसकर
सब सह जायेगी
है
इंसानियत
छिपी कहाँ
प्रश्न
उछाला जायेगा
आवाज़ों के दलदल में
फिर वो
लुप्त
कहीं हो जायेगा
फोड़ ठीकरा किस्मत का
हम
हाथ वही
धुल आयेंगे
फैसलों की आँच में
फिर
नारी की बलि चढ़ाएँगे
वो
फिर भी
मुझे बुलाएगी
चीखेगी
चिल्लाएगी .....
बंद किवाड़ों से अक्सर


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