डॉ. शिप्रा शिल्पी

कविता
ख़ास "तुम" हो बेहद ख़ास
नारी हूँ मैं
पीड़ा टीसती है
प्रेम : आकाश है
बंद किवाड़ों से अक्सर
मुक्तक-१
मैं हूँ एक नदिया
व्यथित मन की अरदास
समर्पण

दीवान

कौन परिन्दें को आ के
पीड़ा से इक आँसू फूटा