अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
12.25.2007
 

सुराखदार थाली
बशीर अतहर
मूल कश्मीरी से अनुवाद – डॉ. शिबन कृष्ण रैणा


हम दोनों
एक ही थाली में खाते थे दही-भात
मेरा अपना।
अचानक यह क्या हो गया?
थाली टूट गई
और बिखर गया दही-भात।
तुमने बसा लिया अपना एक अलग नगर
मैंने भी अपना अलग बसा लिया।
दोनों ने खरीद ली अलग=अलग थालियाँ
और दही-भात का बँटवारा हो गया।
मगर हाय अफ़सोस!
हमें मालूम ही न था कि
हम सूराखदार थाली में खाते रहे थे
और उसके नीचे रिसते दूधिया पानी पर
पल रहा था चुपचाप एक संपोला
जो धीरे-धीरे बन गया एक अजगर
और
डस गया तुम्हें भी और मुझे भी।

पूरा नाम बशीर अहमद मलिक। जन्म १५अप्रेल १९५४, हाकूरा अनन्तनाग कश्मीर में। कश्मीरी के उदीयमान कवि, पत्रकार। इनका कविता-संग्रह ’कनिशहर’ आतंक की छाया में जी रहे आम कश्मीरी-जन की पीड़ा एवं अकुलाहट का प्रतिनिधित्व करने वाला अद्‌भुत दस्तावेज़ है जिसकी एक-एक कविता कवि की मानवतावादी दृष्टि से परिपूरित है।

बशीर अतहर वर्षों तक श्रीनगर दूरदर्शन केन्द्र के मुख्य न्यूज़ एडिटर रहे और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ईरान की राजकीय यात्रा को दूरदर्शन की ओर से कवर करने का श्रेय प्राप्त है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें