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12.25.2007
 

कश्मीरी पंडितों के नाम - कहाँ जाऊँ मैं?
बशीर अतहर
मूल कश्मीरी से अनुवाद – डॉ. शिबन कृष्ण रैणा


तुम यही समझते हो ना
कि, तुम्हारे पलायन पर मैं बहुत खुश हुआ था।
कि मैं इसी ताक में था
कि तुम्हारे हिस्से की थाली हड़पकर
मालामाल हो जाऊँ।
कि, तुम्हारी विरासत का एकमात्र मालिक बन
तुम्हारी ज़मीन को मुट्ठी में कैद कर लूँ।
तुम्हारी हर याद हर निशान को मिटा दूँ
और छोड़ दूँ अपनी छाप तुम्हारी हर चीज़ पर।
लेकिन शायद तुम्हें यह नहीं मालूम कि मैं ने
श्मशानों पर सपनों के महलों का निर्माण तो किया
लेकिन उस निर्माण में मेरे अपने ही स्वप्न खो गए।
तुम्हारे निशान मिटाने की कोशिश में
मेरी अपनी ही पहचान मिट गई मेरे भाई!
ठीक वैसे ही जैसे रेत पर कदमों के निशान
मिट जाते हैं।
तुम समझते हो तुम्हारे अस्तित्व को मैं लील गया
पर, उस प्रयास में मेरा अस्तित्व कहाँ गया
यह शायद तुम्हें मालूम नहीं।
मैंने कल ही एक नई मुहर बनवाई और
लादी ठोंककर हर उस चीज़ पर
जो तुम्हारी थी।
लेकिन यह ख़याल ही न रहा कि
उन कब्रिस्तानों का क्या करूँ
जो फैलते जा रहे हैं रोज-ब-रोज
और कम पड़ रहे हैं हर तरफ़ बिखरी लाशों को समेटने में!
बस, अब तो एक ही चिंता सता रही है हर पल
तुम को चिता की आग नसीब तो होगी कहीं-न-कहीं
पर, मेरी कब्र का क्या होगा मेरे भाई?

पूरा नाम बशीर अहमद मलिक। जन्म १५अप्रेल १९५४, हाकूरा अनन्तनाग कश्मीर में। कश्मीरी के उदीयमान कवि, पत्रकार। इनका कविता-संग्रह ’कनिशहर’ आतंक की छाया में जी रहे आम कश्मीरी-जन की पीड़ा एवं अकुलाहट का प्रतिनिधित्व करने वाला अद्‌भुत दस्तावेज़ है जिसकी एक-एक कविता कवि की मानवतावादी दृष्टि से परिपूरित है।

बशीर अतहर वर्षों तक श्रीनगर दूरदर्शन केन्द्र के मुख्य न्यूज़ एडिटर रहे और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ईरान की राजकीय यात्रा को दूरदर्शन की ओर से कवर करने का श्रेय प्राप्त है।


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