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12.25.2007
 

मौलिक सृजन: अनुवाद और अनुवाद-प्रक्रिया
डॉ. शिबन कृष्ण रैणा


अनुवाद को मौलिक सृजन की कोटि में रखा जाए या नहीं, यह बात हमेशा चर्चा का विषय रही है। अनुवादकर्म में रत अध्यवसायी अनुवादकों का मत है कि अनुवाद दूसरे दर्जे का लेखन नहीं, अपितु मूल के बराबर का ही सृजनधर्मी प्रयास है। बच्चन जी के विचार इस संदर्भ में द्रष्टव्य हैं - मैं, अनुवाद को यदि मौलिक प्रेरणाओं से एकात्मक होकर किया गया हो, मौलिक सृजन से कम महत्त्व नहीं देता। अनुभवी ही जानते हैं कि अनुवाद मौलिक सृजन से अधिक कितना कठिन-साध्य होता है। मूल कृति से रागात्मक सम्बन्ध जितना अधिक होगा, अनुवाद का प्रभाव उतना ही बढ़ जाएगा। वस्तुत: सफल अनुवादक वही है जो अपनी दृष्टि  भावों, कथ्य, आशय पर रखे। साहित्यानुवाद में शाब्दिक अनुवाद सुन्दर नहीं होता। एक भाषा का भाव या विचार जब अपने मूल भाषा-माध्यम को छोड़कर दूसरे भाषा-माध्यम से एकात्म होना चाहेगा तो उसे अपने अनुरूप शब्दराशि संजोने की छूट देनी ही होगी। यहीं पर अनुवादक की प्रतिभा काम करती है और अनुवाद मौलिक सृजन की कोटि में आ जाता है।” (साहित्यानुवाद, संवाद और संवेदना, पृ. 85) मेरा भी यही मानना है कि अनुवाद एक तरह से पुनसृजन ही है और साहित्यिक अनुवाद में अनुवाद को स्वीकार्य, पठनीय बनाने के लिए हल्का-सा फेरबदल करना ही पड़ता है।

यहाँ पर अपने मत की पुष्टि में दो-एक उदाहरण देना अनुचित न होगा। अंग्रेजी का एक वाक्य है- (Small insects are crawling on the floor) हिन्दी में इस वाक्य का अनुवाद यों हो सकता है- 1. छोटे कीड़े फर्श पर रेंग रहे हैं। 2. छोटे-छोटे कीड़े फर्श पर रेंग रहे हैं। पहला अनुवाद शब्दानुवाद कहलाएगा और दूसरा साहित्यिक या भावानुवाद। दूसरा उदाहरण लें- Small leaves are falling from the tree. हिन्दी में इस वाक्य का अनुवाद इस तरह से हो सकता है- 1. छोटे पत्ते वृक्ष - पेड़़ से गिर रहे हैं, 2. नन्हीं पत्तियाँ वृक्ष, पेड़ से गिर रही हैं, 3. नन्हीं-नन्हीं पत्तियाँ पेड़, वृक्ष से गिर रही हैं। इन तीनों वाक्यों में पहला शब्दानुवाद, दूसरा भाव, साहित्यिक अनुवाद तथा तीसरा सृजनात्मक अनुवाद कहलाएगा। हिन्दी अनुवादों के उक्त विभिन्न रूपों में अंग्रेजी के प्रथम वाक्य का दूसरा रूप तथा दूसरे वाक्य का तीसरा रूप अपेक्षाकृत अधिक सुन्दर, सजीव बन पड़़ा है। छोटे नन्हीं की पुनरुक्ति ने अनुवाद के सौन्दर्य को निश्चित रूप से बढ़ गया है। मूलपाठ में यद्यपि इन दो शब्दों की पुनरावृत्ति नहीं थी, क्योंकि अंग्रेजी भाषा की यह प्रकृति नहीं है, मगर हिन्दी-अनुवाद में अतिरिक्त शब्द जोड़ने से अनुवाद में कलात्मकता के साथ-साथ स्वाभाविकता खूब  आ गई है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि  साहित्यिक अनुवादों में सृजनात्मक तत्व की खासी भूमिका रहती है।

अनुवाद एक श्रमसाध्य और कठिन रचना-प्रक्रिया है। वह मूल रचना का अनुकरण मात्र नहीं वरन्‌ पुनर्जन्म होता है। वह द्वितीय श्रेणी का लेखन नहीं, मूल के बराबर का ही दमदार प्रयास है। इस दृष्टि से मौलिक सृजन और अनुवाद की प्रक्रिया प्राय: एकसमान है। दोनों  के  भीतर  अनुभूति  पक्ष  की सघनता रहती है। अनुवादक जब तक कि मूल रचना की अनुभूति, आशय और अभिव्यक्ति के साथ तदाकार नहीं हो जाता तब तक सुन्दर एवं पठनीय अनुवाद की सृष्टि नहीं हो पाती। इसलिए अनुवादक में सृजनशील प्रतिभा का होना अनिवार्य है। मूल रचनाकार की तरह अनुवादक भी कथ्य को आत्मसात` करता है, उसे अपनी चित्तवृत्तियों में उतारकर पुन: सृजित करने का प्रयास करता है तथा अपने अभिव्यक्ति-माध्यम के उत्कृष्ट उपादनों द्वारा उसको एक नया रूप देता है। इस सारी प्रक्रिया में अनुवादक की सृजनप्रतिभा  या कारयित्री प्रतिभा मुखर रहती है। अनुवाद में अनुवादक की कारयित्री प्रतिभा के महत्व को सभी अनुवाद-विज्ञानियों ने स्वीकार किया है। इसी कारण अनुवादक को भी एक सर्जक ही माना गया है और उसकी कला को सर्जनात्मक कला। फिज़्ज़ेराल्ड द्वारा उमर ख़ैयाम की रुबाइयों के अनुवाद को इस सन्दर्भ में उद्धृत किया जा सकता है। विद्वानों का मानना है कि यह अनुवाद ख़ैयाम की काव्य-प्रतिभा की अपेक्षा फिज़्ज़ेराल्ड की निजी प्रतिभा का उत्कृष्ट नमूना है। स्वयं फिज़्ज़ेराल्ड ने अपने अनुवाद के बारे में कहा है कि एक मरे हुए पक्षी के स्थान पर दूसरा जीवित पक्षी अधिक अच्छा है; मरे हुए बाज की अपेक्षा एक जीवित चिड़िया ज्यादा अच्छी है। कहना वे यह चाहते हैं कि अगर मैं ने रुबाइयों का शब्दश: , यथावत अनुवाद किया होता तो उसमें जान न होती,वह मरे हुए पक्षी की तरह प्राणहीन अथवा निर्जीव होता। अपनी प्रतिभा उंड़ेलकर फिज़्ज़ेराल्ड ने रुबाइयों के अनुवाद को प्राणमय एवं सजीव बना दिया है।

जिस प्रकार मूल रचनाकार का लेखन जीवन और जगत`’ के प्रति उसकी मानसिक प्रतिक्रिया होता है, और वह अपनी अनुभूति (प्रतिक्रिया) को शब्दों के माध्यम से कलात्मक रूप में अभिव्यक्त करता है, ठीक उसी प्रकार अनुवादक भी मूल कृति को पढ़कर स्पंदित होता है और अपनी उस अनुभूति (प्रतिक्रिया) को वाणी देता है। इस संदर्भ में डॉ. आदिनाथ सोनटक्के के विचार उल्लेखनीय हैं - अनुवादक को भी जब कोई रचना प्रभावित करती है, तब वह भी अन्तर्बाह्य अभिभूत हो उठता है। यहाँ तक तो अनुवादक और अन्य पाठक की मनोदशा समान-सी होती है  किन्तु अनुवादक अपनी आनंदानुभूति में अन्यों को भी सहभागी करने का इच्छुक होने के कारण अनुवाद करने को विवश हो उठता है, जैसे सर्जक अपने भाव-स्पंदन को शब्दांकित करता है। स्रष्टा कथ्य को मन में घोलता रहता है। अनुवादक भी अनुवाद सामग्री को लक्ष्य भाषा में उतारने के लिए घुटता है। ... एक-एक शब्द का चयन करते समय श्रेष्ठ अनुवादकों को कितना आत्मसंघर्ष करना पड़़ता है, यह सर्वविदित है .... एक प्रकार से अनुवादक अंत: स्फूर्ति एवं अन्त:प्रेरणा से जब ओतप्रोत होगा, तब उसकी रचना चैतन्यदायी तथा प्राणवान होगी।’’

मूल रचनाकार की तरह ही अनुवादक को आत्मविलोपन कर मूल कथ्य की आत्मा से साक्षात्कार करना पड़़ता है। इसके लिए उसकी सृजनात्मक प्रतिभा उसका मार्गदर्शन करती है। अनुवाद-चिंतक तीर्थ बसंतजी ने सृजनात्मक साहित्य और अनुवाद पर सुन्दर विचार व्यक्त किए हैं। वे कहते हैं -’’सृजनात्मक साहित्य में और अनुवाद में अंतर है भी और नहीं भी। सृजनशील लेखक अपने भाषा चातुर्य से यथार्थ का अनुकरण करता है। उसे अपने जीवन  में संसार से जो अनुभव प्राप्त होता है, उसको अपनी कला के माध्यम से अपनी भाषा में प्रस्तुत करता है और अनुवादक उसी अनुकृति का अनुकरण करता है। दोनों ही नकल करते हैं, परन्तु एक अपने भावों को भाषा में उतारता है और दूसरा अपने मन में किसी दूसरे के भावों की प्रतिक्रिया-स्वरूप उत्पन्न भावों का तर्जुमा करता है। .... जिस प्रकार नरगिस का फूल सरोवर में अपनी प्रतिच्छाया देखकर प्रफुल्लित होता है, उसी प्रकार अनुवादक भी अपने व्यक्तित्व की प्रतिच्छाया को दूसरे की कला में पाकर अनुवाद करने को विवश हो उठता है। उसकी कला स्वयं प्रकाशित होते हुए भी किसी ऐसे व्यक्तित्व पर निर्भर करती है, जिसने उसके सुप्त भावों को जागृत किया है।’’

यह सही है कि अनुवाद पराश्रित होता है।  वह नूतन सृष्टि नहीं अपितु सृजन का पुनर्सृजन होता है। इस दृष्टि से अनुवाद-कर्म को मौलिक-सृजन की कोटि में रखने के मुद्दे पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है। तभी कुछ विद्वान इस कर्म को अनुसृजन की संज्ञा देना अधिक उचित समझते हैं। मगर चूँकि दोनों मूल सृजक और अनुवादक अनुभव, भाषा और अभिव्यक्ति-कौशल के स्तर पर एक-सी रचना-प्रक्रिया से गुजते हैं, अत: अनुवाद-कार्य को मौलिक-सृजन न सही, उसे मौलिक-सृजन के बराबर का सृजन-व्यापार समझा जाना चाहिए।

अनुवाद की प्रक्रिया अपने आप  में एक संश्लिष्ट  कार्य- व्यापार है। मौलिक सृजन की तरह ही अनुवादक अनुवाद करते समय सृजन के विभिन्न सोपानों से गुजरता है और अन्तत: एक उत्कृष्ट अनूदित कृति का निर्माण करता है। इस सारी प्रक्रिया में उसके चिंतन-मनन की खासी भूमिका रहती है। प्रसिद्ध अनुवाद-विज्ञानी नाइडा ने चिंतन-मनन की इस स्थिति को अनुवाद-प्रक्रिया के संदर्भ में तीन सोपानों में यों विभाजित किया है:

1. विश्लेषण (analysis)  2. अंतरण (transfer) 3. पुनर्गठन (rearrangement)।

अनुवाद करते समय अनुवादक को क्रमश: उक्त तीनों प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़़ता है। सर्वप्रथम अनुवादक स्रोत भाषा के पाठ का चयन कर उसमें निहित संदेश या आशय का विश्लेषण करता है। इस दौरान वह स्रोत भाषा के मूलपाठ का अर्थ ग्रहण करता है। अर्थ ग्रहण कर लेने के पश्चात वह लक्ष्य भाषा में उसे अंतरित करने की प्रक्रिया में आता है और लक्ष्य भाषा में उसके स्वरूप को निर्धारित कर लेता है। इसके बाद वह लक्ष्य भाषा के स्वरूप प्रकृति, स्वभाव के अनुसार उस कथ्य को पुनर्गठित करता है और इस तरह अनुवाद अपने परिसज्जित (finished) रूप में पाठक के समक्ष पहुँचता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि पुनर्गठन अनुवाद-प्रक्रिया का  अतीव महत्वपूर्ण पक्ष है।

प्रसिद्ध अनुवादक डा. एन. ई. विश्वनाथ अय्यर ने अनुवाद-प्रक्रिया को जिन तीन चरणों, यथा-अर्थग्रहण, मन में भाषातंरण और लिखित अनुवाद, में विभक्त  किया है, वे प्रकारांतर से नाइडा के वर्गीकरण से मिलते-जुलते हैं।

मूलत: अनुवाद प्रक्रिया के अन्तर्गत अनुवादक को दो तरह के पाठों से गुजरना पड़़ता है, 1-पहला पाठ, जो स्रोत-भाषा के रूप में उसके सामने पहले से ही होता है, जिसका रचियता कोई और होता है और उसके पाठक भी कोई और होते हैं। सर्वप्रथम अनुवादक का इसी पाठ से साक्षात्कार होता है। उसका पहला काम मूलपाठ, कृति में निहित संदेश, आशय को अच्छी तरह समझना होता है। दूसरे चरण में वह मूलकृति के समझे हुए संदेश, आशय को  न केवल भाषांतरित करता है अपितु एक नए पाठ के रूप में प्रस्तुत भी करता है। इस सारी प्रक्रिया में अनुवादक का कई तरह के दबावों से गुजरना स्वाभाविक है। एक ओर उसे मूल कृति में निहित संदेश, आशय को लक्ष्य-भाषा में उपलब्ध भाषा-विधान में ढालना पड़़ता है और दूसरी ओर अनूदित पाठ की संरचना कुछ इस प्रकार से करनी पड़ती है कि  वह मूलपाठ के समतुल्य बन कर पाठकों के लिए सहज संप्रेष्य, बोधगम्य हो सके। संरचना की इस प्रक्रिया को नाइडा कुछ इस तरह का मानते हैं-  जिस तरह विभिन्न आकार के बक्सों के सामान को उनसे भिन्न आकार वाले बक्सों में फिर से जमाया जाता है। चूँकि अनुवादक मूलपाठ का रचियता नहीं है, इसलिए संप्रेषण-व्यापार की कई समस्याओं से उसे जूझना पड़ता है। उसके सामने तो मूलपाठ का प्रारूप’, फारमैट मात्र होता है जिसके समानांतर उसे लक्ष्य भाषा में एक नया, अंतरित पाठ तैयार करना होता है। लक्ष्य-भाषा के पाठकवर्ग की अपेक्षाओं एवं भाषिक मानसिकता का उसे पूरा ध्यान रखना पड़ता है। लक्ष्य भाषा की प्रकृति, स्वभाव, संस्कार आदि के अनुरूप उसे अनुवादित-पाठ को सजाना, संवारना पड़ता है। दरअसल, हर भाषा की अपनी एक विशिष्ट कथन-शैली या अभिव्यक्ति-प्रणाली होती है। स्रोतभाषा के पाठ को लक्ष्य-भाषा के संस्कार के साथ सफलतापूर्वक  जोड़ते हुए एक नया, पठनीय पाठ तैयार करना, सचमुच, अनुवादक के लिए एक चुनौती-भरा काम है। यह काम वह अनूदित पाठ के सृजक की हैसियत से थोड़ी-बहुत छूट लेकर कर सकता है। इसके लिए वह पद्य में लिखी मूलकृति का अनुवाद गद्य में कर सकता है, लम्बे-लम्बे वाक्यों को तोड़कर अनुवाद कर सकता है, व्याकरणिक संरचना में फेर-बदल कर सकता है, आदि-आदि। इस सारी प्रकिया में अनुवादक को इस बात का विशेष ध्यान रखना हाता है कि मूल पाठ के संदेश, आशय में कोई फर्क न आने पाए। (अनुवाद -प्रक्रिया  डॉ रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, पृ0 23)                                                 

अनुवाद-प्रक्रिया के जिन विभन्न चरणों या सोपानों की ओर ऊपर इंगित किया गया है, वे सहज होते हुए भी समस्यापूर्ण हैं क्योंकि एक भाषा द्वारा जो अर्थ व्यंजित होता है, उसे दूसरी भाषा में उसी रूप में व्यंजित कर पाना हमेशा संभव नहीं होता । होता यह है कि जब एक भाषा की संकल्पना को दूसरी भाषा में अंतरित किया जाता है, तो अनुवाद समरूप (identical)  न होकर समतुल्य (equivalent) होता है। तब ऐसी भी स्थिति आ जाती है कि अनूदित पाठ में कुछ छूट जाता है, कुछ अतिरिक्त जुड़ जाता है या कुछ मूल से अलग होकर मूल कथ्य को प्रेषित करता है। इस प्रकार अनुवादक को (न चाहते हुए  भी) मूलपाठ तथा अनूदित पाठ में संतुलन बनाए रखने के लिए समझौते करने पड़ते हैं। (अनुवाद का व्याकरण, पृ. 132) डा. भोलानाथ तिवारी का यह कथन कि अनुवाद करते समय न कुछ छोड़ो, न कुछ जोड़ो साहित्यानुवाद में प्राय: कारगर सिद्ध नहीं होता। सुन्दर, सरस एवं पठनीय अनुवाद के लिए यह आवश्यक है कि अनुवादक मूल में आटे में नमक समान- फेरबदल करे। इससे उसका अनुवाद अधिक संगत, स्वाभाविक एवं सहज बनेगा। हाँ, एक बात अवश्य है कि इस सारी प्रक्रिया में मूल की आत्मा की रक्षा करना अनुवादक के लिए अत्यन्त अनिवार्य है।

अनुवाद के अच्छे, बुरे होने के प्रश्न को लेकर कई तरह की भ्रांतियाँ प्रचलित है। आरोप यह लगाया जाता है कि मूल की तुलना में अनुवाद अपूर्ण रहता है, अनुवाद में मूल के सौन्दर्य की रक्षा नहीं हो पाती, अनुवाद दोयम दर्जे का काम है आदि- आदि। अनुवाद-कर्म पर  लगाए जाने वाले उक्त आरोप मुख्यत: अनुवादक की अयोग्यता के कारण हैं। अनुवाद में मूल भाव सौन्दर्य तथा विचार सौष्ठव  की रक्षा तो हो सकती है परन्तु भाषा-सौन्दर्य की रक्षा इस लिए नहीं हो पाती क्योंकि भाषाओं में रूपरचना तथा प्रयोग की रूढ़ियों की दृष्टि से भिन्नता होती है। -- हाँ, मौलिक लेखन के बाद ही अनुवाद होता है, अत: निश्चित रूप से यह क्रम की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि गुणवत्ता की दृष्टि से भी वह दूसरे स्थान पर है। जिस प्रकार मौलिक लेखन बढ़िया भी हो सकता है और घटिया भी, उसी प्रकार अनुवाद भी घटिया - बढ़िया हो सकता है। उक्त आरोपों से अनुवाद-कार्य का महत्व कम नहीं होता। पूर्व में कहा जा चुका है कि अनुवादक दो भाषाओं को न केवल जोड़ता है अपितु उनमें संजोई ज्ञानराशि को एक-दूसरे के निकट लाता है। अनुवादक अन्य भाषा की ज्ञान-संपदा को लक्ष्य भाषा में अंतरित करने में शास्त्रीय ढंग से कहाँ तक सफल रहा है, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि  लक्ष्य भाषा के पाठकों का अनुवाद द्वारा एक नई कृति से परिचित होना है। मूल रचना का स्वल्प परिचय पूर्ण अज्ञान से बेहतर है। गेटे की वे पंक्तियाँ यहाँ पर उद्धृत करने योग्य है जिनमें उन्होंने कार्लाइल को लिखा था, ‘अनुवाद की अपूर्णता के बारे में तुम चाहे कुछ भी कहो, परन्तु सच्चाई यह है कि संसार के व्यावहारिक कार्यों के लिए उसका महत्व असाधरण और बहुमूल्य है।

अनुवाद-प्रक्रिया एवं उससे जुड़े अन्य व्यावहारिक पक्षों पर  ऊपर जो चर्चा की गई है, वह अनुवाद-कला की बारीकी को वैज्ञानिक तरीके से समझने के लिए है। दरअसल, यह अनुवादक की निजी भाषिक क्षमताओं, अनुभव एवं प्रतिभा पर निर्भर है कि उसका अनुवाद कितना सटीक, सहज और सुन्दर बनता है।


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