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11.04.2007
 
दीपावली के अवसर पर
श्याम त्रिपाठी

 जब जब दीवाली आयी
मन में एक ज्योति जगाई
दीवाली दीपों ने
जल जल के दी बधाई ।

सच पूछो तो दीवाली है
दीपक की एक कहानी
युगों युगों से जला रहा है
हर ज्ञानी अज्ञानी।

इस दीपक का प्रकाश
सबको ही भाता है
रामचरित मानस के
मानस की याद दिलाता है।

इस दीपक से जुड़ी हुई हैं कितनी ही यादें
कितनी ही मर्यादायें कितने ही वादे।
हर दीपक जलने का पाठ सिखाता है
निज को जलाकर खुद अंधकार ही पाता है।

दीपक है जीवन का प्रतीक
नि:स्वार्थ भाव के समीप
बसुधा के लिये एक उपहार
भरा है जिसमें मानवता का प्यार।

आज विश्व में जहाँ है इतना तनाव
मानव मानव में खिंचाव
फैला जहां रावणों का साम्राज्य
उत्तर है केवल राम राज्य।

चलो हम आज दिवाली पर
यह शपथ खायें
जो हम से रूठ गये हैं
उन्हें अपने गले लगायें।

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