| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 01.31.2009 |
|
परदेसिन धूप |
|
आषाढ़ी नभ के आँगन में कोई साँवरिया बादल कब से नयन झुकाये, बाँह छुड़ाए शाख शाख से डोरी बाँधे सखि सहेली मिलने आईं पर्वत पर पल भर जा बैठी गले लगी धरती से जैसे |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|