| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 03.22.2008 |
|
बस यूँ ही मैंने |
|
बस यूँ ही मैंने पूछ लिया था...
जीवन पथ पर चलते चलते बस यूँ ही मैंने पूछा था...
वीणा की तारों को छेडूँ यूँ ही मैंने पूछ लिया था--
सागर के मँझधार हो नैया बस यूँ ही मैंने पूछ लिया था...
बिखरे सपनों की घड़ियों में बस यूँ ही मैंने पूछ लिया था...
और मेरे कांधे को छू कर बस यूँ ही मैंने पूछ लिया था... |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|