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| 04.29.2008 |
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अग्नि रेखा |
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कुछ तो कह के जातीं तुम । अनगिन प्रश्न उठे थे मन में उलझी जिन रिश्तों की डोरी खुला झरोखा रखा बरसों आकांक्षाओं का पर्वत ऊँचा ममता की उस गोदी का |
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