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04.29.2008
 

अग्नि रेखा
शशि पाधा


कुछ तो कह के जातीं तुम ।

अनगिन प्रश्न उठे थे मन में
उत्तर रहे अधूरे
मरुथल में पदचिन्हों जैसे
स्वप्न हुए न पूरे ।

उलझी जिन रिश्तों की डोरी
           थोड़ा तो सुलझातीं तुम ।
                 कुछ तो कह के जातीं तुम ।

किस दृढ़ता से लाँघ ली तूने
संस्कारों की अग्नि रेखा
देहरी पर कुछ ठिठकीं होंगी
छूटा क्या, क्या मुड़ के देखा ?

खुला झरोखा रखा बरसों
           जाने को आ जातीं तुम।
                 कुछ तो कह के जातीं तुम ।

आकांक्षाओं का पर्वत ऊँचा
चढ़ते चढ़ते सोचा क्या
जिस आँचल की छाँह पली
उस आँचल का सोचा क्या?

ममता की उस गोदी का
           मान तो रख के जातीं तुम ।
                 कुछ तो कह के जातीं तुम ।


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