शशि पाधा


पुस्तक समीक्षा

मानस मंथन एक मार्मिक अभिव्यक्ति
समीक्षक : कपिल अनिरुद्ध

कविता

अग्नि रेखा
अनुभूति
अनामिका
धूप गुनगुनी
जी चाहता है
ठंडी सी छाँव
नव वर्ष आया है द्वार
परदेसिन धूप
पल दो पल
प्रवासी वेदना
पाहुन
बस यूँ ही मैंने
भावों के पाखी
मन तो बसता अपने देश
वसन्ताभास
शत -शत प्रणाम
संकल्प
सृजन
हम लौटें कल या न लौटे
हिम कण

आलेख

सफलता का रहस्य भावनात्मक बुद्धिमत्ता