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ISSN 2292-9754

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02.06.2017


आगे क्या करना है

और जब मैं वहाँ पहुँची
विज्ञान बहुत बड़ा हो चुका था
तकीनक का अद्भुत विकास था
पर धर्म कुछ सीखने के प्रयास में न था
सत्य भौंचक देखता पीछे-पीछे चलता रहा
तेज़ी से हो रहे परिवर्तनों को
थक कर पीपल के नीचे बैठ गया था कुपोषित ज्ञान
कल्पनाएँ प्रचण्ड, भावनाएँ उच्छृंखल
आदमी देवताओं का इन्तज़ार करने लगा था
इसी कठिन समय में विष्णु सो गये थे
और शिव समाधि से बाहर नहीं आये थे
चारों तरफ भूत पिशाचों का राज
कवि गुफाओं में लौट गये थे
मैंने मार्कण्डेय से पूछा, आगे क्या करना?


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